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भाग जाने की चाहत

यह कैसी जिंदगी है? वह सिर्फ उसे झेले जा रहे हैं। इतने दबावों में कोई कैसे जी सकता है। लगातार उन्हें टूटन महसूस हो रही है। वह कहीं भाग जाना चाहते हैं। लेकिन...।

‘जिंदगी जीने की चाहत भाग जाने से कहीं ज्यादा होती है। हमसे चाहे कितना भी छिन जाए, लेकिन कुछ जरूर बचा रहता है। और हम उसके लिए जुट जाते हैं।’ यह कहना है डॉ. देबोरा खोशाबा का। वह कैलिफोर्निया के इरविन में हार्डीनेस इंस्टीट्यूट की ट्रेनिंग और डेवलपमेंट डायरेक्टर हैं। उन्होंने ‘हार्डी ट्रेनिंग वर्कबुक’ जैसी कमाल की किताब लिखी है।

एक कहावत है, जब तक सांस है, जब तक आस है। इसे गाहे-बगाहे हम सुनते ही रहते हैं। कोई कहता है, तो मुस्करा उठते हैं। लेकिन यह कहावत बतलाती है कि हम कभी हार नहीं मानना चाहते। यानी हम तब तक लड़ना चाहते हैं, जब तक हमारी आखिरी सांस रहती है। और उस सांस तक हम अपनी आस बनाए रखते हैं। यही आस है, जो हमें अपने तमाम दुख-दर्द को झेलने की ताकत देती है।

आज जरूर हम बेहाली में हैं। लेकिन यह जिंदगी का आखिरी कोना नहीं है। उस वक्त हमें जरूर लगता है कि उसके आगे राह नहीं है। कुछ समय के लिए हम मायूस भी हो जाते हैं। पर अपने भीतर कोई आस बनी रहती है कि यह वक्त भी निकल जाएगा।

हम जब खुद को तनाव और दबाव में पाते हैं, तो उससे निकलने के लिए कुछ ठोस करने की जरूरत होती है। हम अपने को अंदर से मजबूत करते हैं, ताकि बुरा वक्त हमें तोड़ न सके। और हम जितने ही अंदर से मजबूत होते हैं, उतनी ही आसानी से वह दौर निकल जाता है। यह मजबूती इसी भरोसे से आती है कि हममें तो अपार संभावनाएं हैं। और हम इस दबाव से अपने को निकाल सकते हैं। यही भरोसा हमें बेहाली में टूटने से बचाता है। जिंदगी जीने की ताकत देता है।
राजीव कटारा

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