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एक शहर जो बनारस है

मैं पांच दिन के बाद बनारस से लौट रहा हूं। ठीक पांच दिन पहले बनारस लौटा था। दोनों ही स्थितियों में फर्क है। मन:स्थिति का फर्क। जब तीन बरस के बाद इस नौ को बनारस लौटा, तो बेचैन था। बेचैनी का आलम ये कि रात एक बजे घाट चला गया और भोर तक वहीं रहा। बनारस में कुछ है नहीं, जो बेचैनी हर सके। रोहित जोशी को जब पहली बार ‘मलक्ष्यो’ का स्वाद चखाया, तो उन्होंने कहा कि मलक्ष्यो की ही तरह एक भ्रम है बनारस। वास्तव में। जिस भ्रम में हम बड़े शहरों की आपाधापी में जीते हैं, उससे बिल्कुल अलग किस्म का भ्रम है बनारस।

मसलन, बनारस आपको गति का अहसास देता है। मैं टंडनजी की दुकान पर लंका पहुंचा, तो वह दिखे नहीं, उनका लड़का था। मैंने पूछा, टंडनजी कहां हैं? उसने बताया कि वह जून में गुजर गए। मैं झोंपा। एक भ्रम टूटा, लगा कि जीवन किसी के नॉस्टेल्जिया के लिए ठहरता नहीं।

मणिकर्णिका पर हम लोग खड़े थे। एक चिता के पास से अचानक आवाज आई, एक लात मारा साले के। मुर्दे का कोई अंग अटक गया था चिता में। कोई सलाह दे रहा था डॉक्टर को कि एक लात मारो, सीधा हो जाएगा (डॉक्टर यानी श्मशान घाट पर चिता जलाने वाला...)। हमारे साथी बड़े दुखी हुए कि बताइए, यहां मरने के बाद भी इंसान की इज्जत नहीं है। गाली दे रहे हैं मुर्दे को! क्यों करे वह शहर किसी मुर्दे की इज्जत, जो उसकी पैदाइश से ही उसका मोल जानता है? कुल मिलाकर मामला दो मन लकड़ी का ही है न, आप चाहे कलेक्टर ही हों।
जनपथ में अभिषेक श्रीवास्तव

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