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ठहराव के मायने

यह होना ही था। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा, यह बात इस बार स्पष्ट थी। पिछली बार ही ब्याज दरें बढ़ाते हुए रिजर्व बैंक के गवर्नर डी. सुब्बाराव ने इस बात के संकेत दे दिए थे कि यह बढ़ोतरी आखिरी है। तेजी से बढ़ती महंगाई को थामने के लिए बाजार में नकदी कम करना अर्थशास्त्र का एक शास्त्रीय नुस्खा है।

रिजर्व बैंक ने इस नुस्खे को मार्च 2010 के बाद से 13 बार अपनाया, हालांकि अर्थशास्त्री भी आश्वस्त नहीं हैं कि इन कदमों का सचमुच महंगाई पर असर पड़ा। उनका तर्क यह है कि महंगाई मुख्यत: खाद्य पदार्थो की मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन की वजह से है और मौद्रिक उपाय इस पर बेअसर होंगे। यह बात रिजर्व बैंक ने भी मानी है कि महंगाई घटाने में उसके मौद्रिक उपायों का सीमित असर ही हो सकता है। वैसे भी ब्याज दरें अनंत काल तक लगातार बढ़ाई नहीं जा सकतीं और यह बात पिछली बढ़ोतरी के वक्त ही साफ हो गई थी कि ब्याज दर बढ़ाने की सीमा आ चुकी है।

इसके अलावा रिजर्व बैंक के उपायों का असर भी विकास दर पर दिखने लगा था। विकास दर का आकलन अब 6.9 प्रतिशत तक आ चुका है। औद्योगिक उत्पादन की दर लगातार घट रही है। भारी ब्याज दर का असर खास तौर पर मंझले दर्जे के उद्योगों पर पड़ता है, क्योंकि उन्हें भारतीय बाजार से ही पैसा उठाना होता है, जो बहुत बड़े और बहुराष्ट्रीय उद्योग हैं, उनके लिए तो पूरी दुनिया खुली है। भारी ब्याज दरों का एक परिणाम यह भी हुआ कि जो निवेश भारत में हो सकता था, वह अन्य ज्यादा फायदेमंद देशों की ओर मुड़ गया।

कई साल में यह पहली बार हुआ है कि भारत में बाहर से जितना निवेश आया, उससे ज्यादा भारत से बाहर निवेश गया। भारतीय उद्योगपति बाहर निवेश करें, यह दूरगामी दृष्टि से भारत के लिए अच्छा होगा, लेकिन अभी तो विकास, रोजगार वगैरह के लिए यह बुरी बात है। ये सारे संकेत रिजर्व बैंक ने भी देखे होंगे।

यह भी अच्छी बात है कि लंबे वक्त के बाद महंगाई भी कुछ कम होती दिखाई दे रही है। खाद्य पदार्थो की महंगाई बढ़ने की दर पांच प्रतिशत से नीचे आ गई है। व्यापक महंगाई की दर अब भी काफी ऊंची है, नौ से दस प्रतिशत के बीच, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि महंगाई काबू में है। ऐसे में रिजर्व बैंक से यह उम्मीद करना व्यर्थ था कि वह ब्याज दरें घटाएगा।

रिजर्व बैंक के अधिकारी यह कह चुके हैं कि महंगाई जब काबू में आ जाएगी, उसके कुछ महीनों के बाद ही ब्याज दरें घटाने की बात सोची जा सकती है। महंगाई के आंकड़ों का जो रुख है, उसे देखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अगले वर्ष अप्रैल में महंगाई सात प्रतिशत तक अगर हो गई, तो ब्याज दरें घटने का सिलसिला शुरू हो सकता है। जाहिर है, अब रिजर्व बैंक को सिर्फ महंगाई के बारे में ही नहीं सोचना है, तेजी से नीचे आती विकास दर का भी उसे ख्याल रखना है।

यह सच है कि विकास दर के धीमे होने में सिर्फ मौद्रिक नीति की ही भूमिका नहीं है, कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कारण हैं। लेकिन जिस अर्थव्यवस्था के दस प्रतिशत से ज्यादा की विकास दर हासिल करने की बात हो रही हो, वह दस प्रतिशत के आस-पास की ब्याज दरों पर नहीं चल सकती। इस बाधा को तो हटाना ही होगा। हालांकि विकास के लिए सिर्फ ब्याज दरें घटाना ही काफी नहीं है, रिजर्व बैंक को बैंकिंग क्षेत्र में दूसरे सुधारों पर भी सोचना चाहिए। इसके साथ ही आर्थिक सुधारों का दूसरा दौर भी तेजी से चलाने की जरूरत है, ताकि विकास के नए रास्ते खुल सकें। वक्त का तकाजा यही है कि वक्त के मुताबिक बदला जाए।

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