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इराक छोड़ते अमेरिकी सैनिक

उस वक्त को आठ वर्ष बीत चुके हैं, जब सद्दाम हुसैन की हुकूमत को मटियामेट करने के इरादे से अमेरिकी व ब्रिटिश फौजों ने कुवैती सरहद लांघकर इराक में पहली बार कदम रखा था। तब उस अभियान को ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ नाम दिया गया था। अब जब बराक ओबामा ने यह ऐलान किया है कि इराकी सरजमीं पर बचे-खुचे अमेरिकी फौजी क्रिसमस पर अमेरिका लौट आएंगे, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि इस जंग की जितनी बड़ी कीमत चुकाई गई, क्या उसकी तुलना में जो हासिल हुआ, उसे संतोषजनक कहा जाएगा?

इराक से एक तानाशाही सत्ता को उखाड़ने के लिए अमेरिका ने बड़ी कीमत चुकाई है। इस जंग में उसके 4,500 जंगजू मारे गए, जबकि अमेरिकी खजाने को भी इसके कारण करीब दस खरब डॉलर का चूना लगा। अमेरिका के लिए वियमनाम युद्ध के बाद का यह सबसे महंगा युद्ध साबित हुआ है। इस लड़ाई में ब्रिटेन के भी 179 फौजी शहीद हुए हैं और इराकियों ने तो इस जंग का भीषण दंश झेला है।

युद्ध के बाद अमेरिकी गवर्नेस की वजह से इस देश ने जबर्दस्त सांप्रदायिक नफरत का दौर देखा। बुश प्रशासन की बाथ पार्टी (सद्दाम हुसैन की राजनीतिक पार्टी) को समूल नाश करने की एकतरफा और अत्यंत अलोकप्रिय नीति की वजह से तथा इराक में शांति व्यवस्था कायम करने के लिए पर्याप्त सैनिक भेजने में पेंटागन की नाकामयाबी के कारण एक लाख बारह हजार इराकी नागरिकों को अपनी जानें गंवानी पड़ीं।

अलबत्ता, कई गंभीर सवाल अब भी उत्तर की प्रतीक्षा में हैं कि क्या वाकई इस युद्ध की जरूरत भी थी? सर जॉन किलकॉट इस बात की जांच कर रहे हैं और उन्हें अपनी रिपोर्ट अभी देनी है। निस्संदेह, जब तक किलकॉट का निष्कर्ष सामने नहीं आ जाता, तब तक इस लड़ाई में ब्रिटेन की भागीदारी का सही-सही विश्लेषण नहीं हो सकता। बहरहाल, राष्ट्रपति ओबामा ने सही कहा है, ‘अमेरिकी जवानों की आखिरी टुकड़ी जब इराक को अलविदा कहेगी, तो उसका सिर ऊंचा होगा। हमारे सैनिक ससम्मान इराकी सीमा से बाहर निकलेंगे।’ जाहिर है, उन्हें उनके राजनीतिक आकाओं की नादानियों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
द टेलीग्राफ, ब्रिटेन

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