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उत्तर में किसान सड़कों पर फेंक रहे आलू

दिल्ली की आजादपुर मंडी में गुरुवार को जिस आलू का थोक मूल्य 80 पैसे प्रति किलो रहा वही केरल की मंडी में वह 18 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिका। राजधानी के फुटकर बाजार में भी दिल्लीवासियों ने इसे 10 से 12 रुपये किलो के रेट पर खरीदा।

बाजार और व्यवस्था का खेल कुछ ऐसा है कि किसानों को उनकी उपज का मूल्य नहीं मिल रहा जबकि वही चीज उपभोक्ता को बेहद ऊंचे दाम पर खरीदनी पड़ रही है। हालात यह है कि खरीददार न होने के कारण पंजाब के किसानों को सैकड़ों क्विंटल आलू सड़कों पर फेंकना पड़ रहा है।

आलू की बंपर फसल होने के बावजूद यह हाल भंडारण तथा ढुलाई व्यवस्था के अभाव में हो रहा है जिसके चलते हर साल लगभग सवा लाख टन आलू बर्बाद होता है।

केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के मुताबिक देश में हर साल औसतन 280 लाख टन आलू का उत्पादन होता है जबकि भंडारण क्षमता महज 180 लाख टन की है। यह हर साल 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की सब्जियों की बर्बादी का हिस्सा है। किसानों और उपभोक्ताओं की समस्या को केंद्र-सूबों की खींचतान भी बढ़ा रही है। किसान उपज का उचित मूल्य मांग रहे हैं। पंजाब के किसानों की मांग है कि उन्हें एक रुपये प्रति किलो के हिसाब से सब्सिडी मिले। इसे राज्य केंद्र के सिर डाल रहा है।

कृषि सचिव पी.के. वसु का कहना है कि अगर केंद्र के पास राज्य से बाजार हस्तक्षेप योजना के तहत सब्सिडी का कोई प्रस्ताव आएगा तो उस पर विचार किया जाएगा। अभी ऐसा प्रस्ताव नहीं आया।

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