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कस्बों और शहरों की सुधारनी होगी सेहत

भारत के शहरों को रहने लायक बनाने के लिए 2030 तक 1.2 लाख करोड़ डॉलर (लगभग 65 लाख करोड़ रुपये) खर्च करने पड़ेंगे। मैकेंजी ग्लोबल इंस्टीटय़ूट की इंडियाज अर्बन अवेकनिंग नामक रिपोर्ट इस बात की तसदीक करती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान नहीं दिया गया तो शहरों के हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जाएंगे। मौजूदा हालात इशारा कर रहे हैं कि कस्बाई और शहरी इलाकों की जरूरतों और मांग के बीच फासला बढ़ता जा रहा है जो स्थितियों को बिगाड़ रहा है। इन स्थितियों में भारत के तेजी से बढ़ते ग्रोथ रेट की बात करना बेमानी होगा।

यहां पर एक बड़ा सवाल ये है कि स्थितियों को बेहतर करने के लिए क्या उपाय अपनाने होंगे। हालांकि सभी जगहों को पारंपरिक शहर के लिए आवश्यक सुविधाओं की जरूरत नहीं होगी लेकिन इन जगहों पर कुछ बुनियादी सुविधाओं जैसे कि पानी की आपूर्ति, कचरे और सीवेज डिस्पोजल आदि को पूरा करना एक बड़ी चुनौती होगा।

पूरे देश में पॉलीथीन का इस्तेमाल एक बड़ी समस्या है। इस दिक्कत को दुरुस्त करने का प्रमुख तरीका है कि सिविक सिस्टम को उम्दा बनाया जाए। ये समस्या पूरे देश में है। इन सभी समस्याओं को हल करने के तीन तरीके हो सकते हैं। पहला राष्ट्रीय ग्रामीण जीविकोपजर्न मिशन द्वारा प्लास्टिक कचरे को डिस्पोज करने की एक चेन बनानी होगी। इस मिशन में इसे एकत्र करने, रिसाइकिल करने और छांटने की भी व्यवस्था करनी होगी।

दूसरा सभी कार्पोरेशन, पंचायत और तालुका को बेहतर डिस्पोजल सिस्टम बनाने के लिए काम करना होगा। प्लास्टिक का व्यवस्थित तरीके से प्रयोग करने और दोबारा इस्तेमाल करने के लिए नीति बनानी होगी। तीसरा उपाय ये है कि पॉलीथीन बैग बनाने वाली सभी यूनिटों को बंद करना होगा या फिर एक ऐसी टैक्स संरचना बनानी होगी जो कि इस पर रोकथाम लगा सके।

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