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पूर्वा की मौत ने डॉक्टरी के पेशे पर खड़े किए

 बरेली । वरिष्ठ संवाददाता। पूर्वा की मौत ने एक बार फिर से डॉक्टरी पेशे की शुचिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। चाहें वह मरीज के इलाज के प्रति गंभीरता हो या फिर उसे भयाक्रांत कर भ्रमित करने की कोशिश। संभव है कि ऐसा हर डॉक्टर न करता हो मगर ज्यादातर मामलों में पेशे में छिपा लालच और सेवा की शपथ के प्रति बेईमानी उभर कर सतह पर आ जाती है। ऐसे में तीमारदारों का दुखी और नाराज होना या फिर मरीज और डॉक्टर के बीच विवाद पैदा होना लाजिमी है।

दरअसल, डॉक्टरी का पेशा इलाज से ज्यादा कहीं, विश्वास पर टिका है। यह डॉक्टर भी मानते हैं और अब तक चिकित्सा जगत में हुए शोध भी। लेकिन ऐसा क्या वजह है जो किसी डॉक्टर या अस्पताल को कठघरे में खड़ा करती है तो वह है उनके प्रति विश्वास की कमी। और इसे मजबूत करते हैं पूर्वा की मौत जैसे केस। पहली बात यह कि डेढ़ माह की बच्चाी को सेप्सिस, बाइलेटरल निमोनिया व सेप्टीसीमिया था यानि उसकी दशा बेहद नाजुक थी।

दूसरे, उसे आईसीयू में भर्ती किया गया था। जाहिर है कि पूर्वा के केस में चूक की कोई गुंजाइश नहीं थी। अगर डाक्टरी पेशे से जुडेम् विशेषज्ञों की मानें तो ऐसे केस सॉल्व करना न सिर्फ बेहद मुश्किल होता है बल्कि सामान्यत: मरीज के तीमारदारों को हकीकत बता भी दी जाती है लेकिन इस केस में शायद ऐसा नहीं हुआ।

बच्ची का दवा सही दी गई या गलत, यह आरोप-प्रत्यारोप का विषय हो सकता है लेकिन उसकी मौत के बाद जो हुआ, वह मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाला है। अस्पताल प्रबंधन ने मौत के बाद पूर्वा के शव को अस्पताल गेट के पास बने टिन शेड वाले कमरे में रखवा दिया। लेकिन उसकी मौत की खबर परिजनों को नहीं दी। इससे पहले अस्पताल वाले पुलिस वालों के साथ जब बच्ची को लेकर वार्ड से निकल रहे थे, तब भी यह बताना जरूरी नहीं समझा कि यह शव उनकी बेटी पूर्वा का है। फिर पूरे मामले में संदेह पैदा करने वाले हालात पैदा करने का क्या मतलब था? ऐसा भी नहीं कि बच्चाी के इलाज में हो रहे खर्च का उसके परिजन भुगतान न कर रहे हों। पूरा का पूरा भुगतान, फिर यह लुका-छिपी क्यों? दूसरे अस्पतालों के पिछले अनुभव यह बताते हैं कि सामान्यत: यह उन केसों में ज्यादा होता है जहां तीमारदार, मरीज की मौत होने पर अस्पताल का भुगतान करने में आनाकानी करते हैं।

उस स्थिति में अस्पताल वाले मरीज के शव को तब तक अपने कब्जे में रखते हैं जब तक कि पूरा भुगतान नहीं हो जाता। पूर्वा के केस में सबसे ज्यादा खराब बात यह हुई कि जिन डॉक्टर्स को सांत्वना और प्यार से पूर्वा के परिजनों का भरोसा बरकरार रखना चाहिए था, वे भिड़ने की मुद्रा में आ गए। ऐसे में बेबस और लाचार बच्चाी के मां-बाप या परिजनों के लिए गुस्सा जाहिर करने और अपने नसीब को कोसने के अलावा आखिर विकल्प ही क्या था? बहरहाल, पूर्वा जाते-जाते डॉक्टरी पेशे से जुड़े लोगों के लिए यह सवाल छोड़ गई है कि यदि पेशे में भरोसे की कमी और लालच बढ़ा तो मरीज और डॉक्टर के रिश्ते तार-तार होंगे ही।

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