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तलाश एक संतुष्ट गुटनिरपेक्ष लेखक की

हिंदी के किसी लेखक को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिल जाए, तब भी उसके बाद उसके जो इंटरव्यू छपेंगे, उनमें एक वाक्य जरूर होगा- मुझे मेरे कृतित्व के मुताबिक यश नहीं मिला, मेरी साहित्य में कदर नहीं हुई, क्योंकि मैं गुटबंदी में शामिल नहीं था। मैं जब से कुछ लिखने-पढ़ने लगा हूं, तभी से उस लेखक की तलाश में हूं, जिसकी प्रतिभा को पहचाना गया और उसके योग्य सम्मान मिला, दूसरे उस लेखक की तलाश में हूं, जो किसी गुटबंदी में शामिल हो।

साहित्य में सैकड़ों पुरस्कार हैं, पद हैं, हजारों सेमिनार हैं, देश और विदेश की यात्राएं हैं, इन सबमें कई लेखक दिखते रहते हैं। लेकिन कोई नहीं कहता कि हां, साहित्य में उसे कुछ मिला। वर्ष 2016 में भारत शायद अपना समानव अंतरिक्ष यान छोड़ेगा, अगर तब किसी लेखक का कहानी, कविता पाठ या भाषण करवा दिया जाए, तो हो सकता है कि वह संतुष्ट हो जाए, अमेरिका, जर्मनी, पोलैंड की यात्रा से वह संतुष्ट होने से रहा।

नोबेल पुरस्कार मिलने पर वह यही कहेगा- यूनिवर्सिटी ने शुक्लाजी की सीनियरिटी पूरे एक दिन की मानी और उन्हें एक दिन पहले प्रमोशन देकर प्रोफेसर बना दिया। मैं तो राजनीति करता नहीं, चुपचाप पढ़ाता हूं और लिखने-पढ़ने में लगा रहता हूं। वीसी दफ्तर के चक्कर काटने की यहां किसको फुरसत है, वैसे भी हिंदी में गंभीर लेखक का सम्मान कहां है। बंगाल में देखो, मुख्यमंत्री लेखकों का कितना सम्मान करते हैं, हिंदी में ऐसी कोई संस्कृति ही नहीं है।

जिस लेखक से बात करो, वह गुटबंदी की वजह से उसे होने वाले नुकसान का जिक्र करेगा। लेकिन ऐसा कोई लेखक नहीं मिलेगा, जो गुटबंदी में शामिल हो। ऐसा लगता है कि साहित्य में गुटों की एक अदृश्य सत्ता है, जिसके सदस्यों के नाम गुप्त रखे जाते हैं, रहस्यमय संप्रदायों या माफिया गिरोहों की तरह।

किसी लेखक से कहें- आप तो अमुकजी के करीब हैं..? तो वह कहेगा- खाक करीब हैं, अगर करीब होता, तो उस सेमिनार में दूबेजी जाते। मई में जो प्रतिनिधिमंडल चीन गया था, उसमें मेरा नाम होता। बहरहाल, अगर किसी को ऐसा कोई लेखक मिले, जिसके कृतित्व का समुचित मूल्यांकन हुआ हो और घोषित रूप से किसी गुट में हो, तो मुझे सूचित करें।
राजेन्द्र धोड़पकर

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