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आम असहमति

लोकपाल के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक का नतीजा यह बतलाता है कि सारी पार्टियों में आम सहमति की उम्मीद निकट भविष्य में तो नहीं है। अगर सरकार कोई ऐसा बिल लाना चाहती है, जिससे सारी पार्टियां भी खुश हों और टीम अन्ना को भी उस पर ऐतराज न हो, तो इसके लिए काफी वक्त और मेहनत की जरूरत है। संसद का शीतकालीन सत्र 22 दिसंबर को खत्म हो रहा है, इसलिए ऐसा बिल इस सत्र में लाना और उसे पारित करवाना अब बहुत दूर की कौड़ी लगती है।

ऐसा नहीं है कि लोकपाल बिल पर असहमति किन्हीं बुनियादी मुद्दों पर है। सारी पार्टियां सहमत हैं कि लोकपाल एक मजबूत और स्वायत्त संस्था होनी चाहिए। इस मुद्दे पर कुछ असहमति है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए या नहीं, लेकिन ज्यादातर पार्टियां मानती हैं कि कुछ प्रावधानों और सावधानियों के साथ प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए। ज्यादातर असहमति इस पर है कि क्या सीबीआई को लोकपाल के तहत होना चाहिए।

यह सब मानते हैं कि सीबीआई को सरकारी नियंत्रण और दबाव से मुक्त किया जाना चाहिए, हालांकि सीबीआई और लोकपाल के रिश्ते क्या हों, इस पर काफी मतभेद हैं। मतभेद का एक मुद्दा छोटे कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने को लेकर भी है। टीम अन्ना का यह कहना है कि आम आदमी का साबका छोटे स्तर के भ्रष्टाचार से पड़ता है, इसलिए उसे राहत तभी मिलेगी, जब ग्रुप सी और डी के कर्मचारी भी लोकपाल के दायरे में आएं। सरकार इन कर्मचारियों के लिए अलग कानून बनाने के पक्ष में है और बाकी पार्टियों में इस पर मतभेद है।
मत-मतांतरों को छोड़ भी दिया जाए, तो राजनीतिक दलों का रुख यह बताता है कि जंतर-मंतर पर उन्होंने जो कुछ कहा हो, लेकिन वे टीम अन्ना के दबाव में कोई फैसला करना या करते हुए दिखना नहीं चाहते। वे संसद के सर्वोच्च होने की बात स्थापित करना चाहते हैं। वे लोकपाल के बारे में टीम अन्ना के विचारों से मोटे तौर पर भले ही सहमत हों, लेकिन वे ऐसा कानून बनाना चाहते हैं, जो संसद की अपनी भावनाओं और राय के अनुकूल हो। यह ठीक भी है।

अन्ना हजारे के आंदोलन की लोकप्रियता पर शक नहीं किया जा सकता और भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनके संघर्ष की भी सराहना करनी चाहिए, लेकिन देश का कामकाज चलाने और उसके लिए नियम बनाने का काम संसद का है, हमारे लोकतंत्र में उसकी स्थिति सर्वोच्च है। संसद को जनमत का आदर करना चाहिए, लेकिन उसे किसी बाहरी दबाव में कानून नहीं बनाना चाहिए। हालांकि आम सहमति के लिए लोकपाल को अनिश्चित काल तक टाला भी नहीं जा सकता।

यह सच है कि कितना ही सशक्त लोकपाल हो जाए, वह भ्रष्टाचार मिटाने का एकमात्र अचूक उपाय नहीं है, लेकिन अब जनता में लोकपाल बिल सार्वजनिक जीवन में शुद्धता का प्रतीक बन गया है। इसीलिए बेहतर हो, अगर सारी पार्टियों के नेता मिलकर इस बिल पर आम सहमति बनाएं। यह सिर्फ उनकी ही नहीं, संसद की विश्वसनीयता का सवाल है। सर्वदलीय बैठक में जो असहमतियां सामने आई हैं, वे ऐसी नहीं हैं कि उन्हें दूर नहीं किया जा सके, बशर्ते ऐसी इच्छाशक्ति हो। अगर सारी पार्टियां किसी मसौदे पर राजी हो जाती हैं और बिल संसद से पारित हो जाता है, तो अन्ना हजारे की टीम के लिए भी विरोध करना आसान नहीं होगा।

अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त है, लेकिन आखिरकार जनता के नुमाइंदे तो वे ही हैं, जिन्हें जनता ने चुनकर भेजा है। यह वक्त है कि वे साबित करें कि वे जनता का सही मार्गदर्शन कर सकते हैं।

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