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नेपाल और तीन अहम मुद्दे

शांति प्रक्रिया और संविधान लेखन को लेकर देश की राजनीतिक पार्टियां आगे बढ़ी हैं, लेकिन कुछ बड़ी कठिनाइयां अब भी बनी हुई हैं। इस वक्त तीन बड़े मसले हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है।

पहला तो यही कि माओवादी लड़ाकों के एक समूह का फौज में एकीकरण का काम पूरा हो चुका है, पर अब जिन लोगों ने स्वेच्छा से रिटायरमेंट का रास्ता चुना है, उन्हें ससम्मान घर भेजने का काम करना है। यह बेहद संवेदनशील काम है, क्योंकि यदि इस समूह के साथ जरा-सा भी बुरा व्यवहार हुआ, तो वह भड़क सकता है। इसलिए जरूरी है कि तमाम संबंधित पक्ष यह सुनिश्चित करें कि इन पूर्व लड़ाकों में मोह भंग का भाव न रहे, क्योंकि ऐसी कोई भी स्थिति इन लड़ाकों को तनावग्रस्त करेगी। ऐसे में कई गंभीर समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।

मसलन, ये माओवादी लड़ाके पार्टी के उन कट्टरपंथियों के साथ मिल सकते हैं, जो सड़कों व गलियों में अपनी हरकतों से सरकार की अच्छी कोशिशों व संविधान रचने की प्रक्रिया को बाधित करने पर आमादा हैं। फिर इस बात की भी आशंका  है कि वे जिन इलाकों में लौटेंगे, वहां अराजकता की स्थिति पैदा हो जाए। इसलिए इन बातों पर गहराई से नजर रखने की दरकार है।

दूसरा मसला संविधान का मसौदा तैयार करने से जुड़ा है। संविधान को लेकर नए सिरे से समझौते का रास्ता खोला जा रहा है। यह सुखद है कि निर्वाचन प्रक्रिया को लेकर सभी दलों में आम सहमति बन गई है। लेकिन शासन प्रणाली और संघीय ढांचे को लेकर अब भी मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में, इस समय जरूरी है कि सियासी पार्टियां दलगत संकीर्णताओं से ऊपर उठते हुए एक व्यापक सिद्धांत पर सहमति बनाने के प्रयास करें।

तीसरा, यह अच्छी बात है कि नेपाली कांग्रेस और यूएमएल पार्टी ने प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई के नेतृत्व में राष्ट्रीय सरकार में शामिल होने के संकेत दिए हैं। इससे देश में राजनीतिक स्थायित्व कायम करने में मदद मिलेगी। जरूरी है कि बाबूराम भट्टाराई सभी पार्टियों, खासकर बड़े राजनीतिक दलों को भरोसे में लें और उन सभी को सरकार में शामिल करें।
द काठमांडू पोस्ट, नेपाल

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