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बहस कहीं भी हो लेकिन...

पूर्व लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के लेख ‘संसद ही है बहस की सही जगह’ में जो तथ्य सामने रखे गए हैं, उन पर विचार करना निहायत जरूरी है। मौजूदा खेल में कहीं ऐसा न हो कि भारत का प्रधानमंत्री एक ऐसा खिलौना बना दिया जाए, जिसका काम सिर्फ तथाकथित जन-लोकपाल का दिल बहलाने तक सीमित हो जाए। आजकल भ्रष्टाचार की चिंता करने वालों की भरमार हो गई है। जरूरी है कि इस पर बहस हो और बेहतर है कि वह संसद से लेकर खेत-खलिहानों तक सभी जगह हो। इससे लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होंगी। लेकिन यह ध्यान में रखना होगा कि जो कानून बनेंगे, उनके लिए बहस का स्थान संसद ही है, कोई दूसरी जगह नहीं। मीडिया की अपनी मजबूरियां हैं। उसे अपनी आमदनी के लिए प्रतिदिन किसी न किसी का ढोल बजाना पड़ता है। कुछ राजनीतिक दल अन्ना टीम के गरम तवे पर अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। तवा दूसरे का हो, तो उसका मजा ही कुछ और है। पर विपक्ष भूल रहा है कि संसद की  गरिमा को बनाए रखना बेहद जरूरी है। भीड़ को देखकर बौरा जाना स्वस्थ परंपरा नहीं है।    
सुभाष लखेड़ा, सिद्धार्थ कुंज, द्वारका, नई दिल्ली

लोकपाल और मलाई
एक राजा चूहों से परेशान था। जनता की राय पर बिल्ली पाली गई। बिल्ली के दूध के लिए गाय और गाय के लिए रखा गया सेवक। सेवक मलाई खाने लगा। राजा से शिकायत की गई, तो सेवक ने एक दिन सोते हुए राजा के मुंह पर मलाई लगा दी और कहने लगा कि राजा सोते समय मलाई खाता है। यही हाल लोकपाल (जन) का होने वाला है और सेवक मलाई खाता रहेगा।
संतोष कुमार वर्मा, मिलाप नगर, उत्तम नगर, नई दिल्ली-59

फिल्मों में धूम्रपान
सिनेमा के परदे पर अभिनेताओं को धूम्रपान करते देखकर दर्शकों, नवयुवकों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इस वात का समर्थन मनोवैज्ञानिक भी करते आए हैं। यह कहना कि कुछ दृश्य धूम्रपान से ही सजग बनते हैं- उचित नहीं है। अगर निर्देशक में इच्छाशक्ति हो, तो वह पात्रों से बिना धूम्रपान करवाए भी बेहतरीन अभिनय करवा सकता है। धूम्रपान के दृश्यों के समय सिर्फ चेतावनी लिख देने भर से कोई लाभ होने वाला नहीं। इसका कोई असर नहीं होता। केंद्र सरकार चाहे, तो वह इस संबंध में कानून बनाकर बॉलीवुड में धूम्रपान के फिल्मांकन पर रोक लगा सकती है। लेकिन वह ऐसा नहीं कर रही। ऐसे में शक होता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार धूम्रपान माफिया के सामने झुक गई है?
नवीनचंद्र तिवारी, रोहिणी, दिल्ली-85

अमर्यादित आचरण
भारत में गुरु को श्रद्धा से देखने की प्रथा बहुत प्राचीन है। संत कवि कबीरदास ने तो गुरु को भगवान के समकक्ष खड़ा किया है। वास्तव में, गुरु समाज और देश के कर्णधार होते हैं। इस तथ्य से कभी किसी ने इनकार नहीं किया। तमाम विद्रूपताओं के बीच देश आज भी इस पद की गरिमा को बचाए हुए है। लेकिन पंजाब के मुक्तसर में पिछले दिनों जो घटना घटी, उससे न केवल पंजाब की प्रतिष्ठा, बल्कि पूरे भारत वर्ष की हजारों वर्षों से संजोई मर्यादा को आघात पहुंचा है। एक सरपंच ने रविंदर कौर नाम की अध्यापिका को जिस बेशर्मी से थप्पड़ मारा, उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए, कम है। इस कांड का विरोध करने वाली अध्यापिकाओं पर लाठीचार्ज किया गया और उनके बाल पकड़कर खींचे गए, ये घटनाएं क्रूरतापूर्ण और अमानवीय हैं। ये घटनाएं गुरु और नारी, दोनों को अपमानित करने  वाली हैं। ऐसी घटनाओं को सहन नहीं करना चाहिए।
मुहम्मद इमरान, अजमेरी गेट, दिल्ली-6
mohd1970imran@gmail.com

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