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महंगाई के दलदल में फंसा विकास का पहिया

भारतीय अर्थव्यवस्था एक कठिन दौर से गुजर रही है। देश में विकास का थर्मामीटर माने जाने वाले औद्योगिक उत्पादन की रीडिंग खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। फिलहाल विकास की बात तो दूर यह निगेटिव हो गई है।  क्या वजह रही विकास के पहिए के धंसने की, बता रहे हैं हिन्दुस्तान के डिप्टी बिजनेस एडीटर विनय कुमार मिश्र

महंगाई की दर और विकास की गति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। होना तो यही चाहिए कि दोनों को इस तरह देखा जाए कि सिक्का पूरा दिखाई दे, लेकिन पिछले एक साल से सिर्फ महंगाई के पहलू पर ही ध्यान दिया जा रहा है। इसके चलते यह सिक्का खोटा साबित हो रहा है। अंत में हुआ यह कि न तो महंगाई घटी और न ही विकास हुआ।

अर्थशास्त्र का सीधा सा सिद्धांत है कि जिस चीज की मांग ज्यादा होगी और आपूर्ति कम, उसके दाम बढ़ेंगे, और जिस चीज की आपूर्ति ज्यादा होगी उसके दाम घटेंगे। देश में महंगाई का रोना रोया जा रहा है, और सरकार अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाते हुए रिजर्व बैंक को इससे लड़ने का ठेका पिछले एक साल से दिए हुए है। रिजर्व बैंक सामानों की मांग और आपूर्ति में कुछ कर नहीं सकती थी, तो उसने रुपये की मांग और आपूर्ति में हस्तक्षेप शुरू किया। रिजर्व बैंक की राय थी कि बैंक आसानी से और सस्ता कर्ज उपलब्ध करा रहे हैं, जिससे लोग आसानी से सामान आदि खरीद रहे हैं। बस फिर क्या था कर्ज का महंगा होना शुरू हुआ। रिजर्व बैंक ने एक साल के अंदर अपनी प्रमुख दरों में करीब साढ़े तीन प्रतिशत की बढ़त कर दी। इसके चलते बैंकों का कर्ज इससे भी दोगुना तक महंगा हो गया।

लेकिन यहां पर एक बात को नजरअंदाज किया गया कि अगर सामान या अन्य चीजें खरीदने की हैसियत किसी की नहीं रहेगी तो वह बनेंगी क्यों। कंपनियों को भी कर्ज महंगा पड़ रहा था, जिससे उन्होंने भी उत्पादन बढ़ाने के प्रयास कम किए। एक तरफ कंपनियों ने अपनी विस्तार की योजनाओं को त्याग दिया, वहीं महंगे कर्ज के कारण उत्पादन की रफ्तार को भी नियंत्रित किया। एक साल बीतते-बीतते यह नियंत्रण इतना बढ़ गया कि उत्पादन लगभग शून्य के स्तर पर पहुंच गया। जानकारों की राय में कंपनियों के पास इतना स्टॉक हो गया है कि नया निर्माण करने से अच्छा है कि रखा सामान पहले निकल जाए, जिससे कुछ पैसा आ सके। यह तो अभी तक हो चुका है, लेकिन इसके परिणाम ङोलने का समय अब आने वाला है। अगर रिजर्व बैंक ने सख्ती नहीं घटाई और सरकार ने ऐसे कदम नहीं उठाए तो उद्योगों के सामने छंटनी करने की मजबूरी आ सकती है। और जिसके पास नौकरी या कमाई का जरिया नहीं रहता है उसके लिए महंगाई तो छोड़िए एक टाइम का खाना भी बड़ी चीज हो जाता है।  जिस महंगाई को रोकने के नाम पर पूरा खेल हुआ, अंत में वह वहीं पर खत्म हो रहा है, जहां से शुरू हुआ था।

रही सरकार की बात, तो उससे जरूर पूछा जाना चाहिए कि अगर टमाटर और प्याज का दाम बढ़ा हुआ है तो रिजर्व बैंक की सख्ती से क्या होगा। ऐसा होने के दो ही कारण हो सकते हैं। पहला कि उत्पादन में कमी और दूसरा बिचौलियों की मुनाफा वसूली। दोनों स्थितियों पर नियंत्रण की जिम्मेदारी सरकार की थी। अगर उत्पादन कम था तो इन चीजों का समय पर आयात होना चाहिए और बिचौलिए अगर हावी हैं, तो उन पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए थी। वैसे ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है, कुछ माह पहले जब प्याज की कीमतें अखबारों के पहले पेज की खबर बनने लगी थीं, तो सरकार ने थोक व्यापारियों पर छापेमारी शुरू की थी। रिजल्ट आने में ज्यादा समय नहीं लगा था और कुछ ही दिनों में भाव उसी रेट पर आ गए, जहां जनता को परेशानी न हो।

सीधी सी बात है, जब सरकार ने सख्ती की, तो भाव घटे। इस भाव को घटाने के लिए व्यापारियों ने घाटे में सामान नहीं बेचा, हां बेजा लाभ सरकार ने नहीं उठाने दिया। यानी महंगाई बाजार में अधिक पैसों की वजह से नहीं सरकार की ढिलाई का फायदा उठा कर ज्यादा मुनाफा कमाने से थी। अगर सरकार ने यही सख्ती एक साल पहले ही की होती, तो रिजर्व बैंक को बेकार का प्रयास नहीं करना पड़ता। न ब्याज दरें बढ़तीं, न ही लोगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता। सस्ता कर्ज मिलता और बाजार में मांग बनी रहती तो कंपनियां तेजी से विस्तार योजनाएं चलातीं, जिससे नए-नए लोगों को रोजगार मिलता। कुछ और लोगों को रोजगार मिलता तो बाजार को कुछ और खरीदार मिलते, जिनकी जरूरत का सामान बनता और कंपनियां फिर विस्तार की योजनाएं बनातीं। यानी विकास का जो पहिया दलदल में फंस गया है, वह हाईवे पर दौड़ती मर्सिडीज की तरह दिखाई देता। एक साल तो खराब हो ही गया है, पर आने वाले साल को बचाया जा सकता है, सिर्फ देर हुई है, अंधेर होने से बचाया जा सकता है। और इस सबके लिए जरूरत है सरकार को सिर्फ अपना काम ईमानदारी और तत्परता से करने की।

योग्यता बढ़ाएं
दुनिया में हालात चाहे जो हों, यह चलती ही रहती है। अब यह समय की बात है कि यह अच्छी तरह चलती है या खराब तरह से। ऐसे में जरूरी है कि लोग शॉर्ट कट मारने की जगह योग्यता बढ़ाने पर ध्यान दें। जब भी ऐसे हालात आते हैं तो छंटनी की बात आती है। पर कंपनियां बंद नहीं होतीं।  जरूरी है कि लोग ऐसी क्षमता दिखाएं कि अगर कंपनी में एक भी आदमी बचेगा तो वही होगा। हालांकि ऐसा कहना आसान है, पर करना कठिन, फिर भी असंभव नहीं है।

 

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