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सुधार के लिए ईमानदार प्रयासों की आवश्यकता

बीते कुछ सालों से सरकार अपनी सबसे कठोर लड़ाई मुद्रा स्फीति से लड़ती आ रही है। ‘मुद्रा स्फीति अगले तीन महीनों में 5-6 प्रतिशत तक कम हो जाएगी,’ योजना आयोग से ले कर नार्थ ब्लॉक तक यही आवाज बाहर आती रही है। और यह तीन महीने शायद नए साल के कैलेंडर में दिखाई दे सकते हैं। लेकिन मुद्रा स्फीति की इस अलग-अलग बयानबाजी में इकलौते अपवाद के रूप में सी. रंगराजन ही ऐसे व्यक्ति हैं जो अपने वाक्य की शुरुआत ‘आशा तो है’ से करते हैं। उनका यह कहना ही सरकार और उनके मंत्रियों के मुद्रा स्फीति के बारे में आत्मविश्वास को दर्शाता है।

औद्योगिक उत्पादन में 5.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। 6 प्रतिशत निर्माण, खनन में 7.2 प्रतिशत और चौंकाऊ रूप से पूंजीगत माल में 25.5 प्रतिशत की गिरावट है। इसके बावजूद मोंटेक सिंह अहलूवालिया चाहते हैं कि हम जीडीपी आंकड़ों के लिए तीसरी तिमाही का इंतजार करें। रंगराजन ने यह कह कर चौंकाया कि उन्हें नहीं लगा था कि गिरावट इतनी ज्यादा होगी।

सरकार दो बातें कह रही है, पहली, मुद्रा स्फीति वैश्विक समस्या है और भारत इस समस्या के लिए असुरक्षित है, खास कर खाद्यान्न को लेकर। हालांकि खाद्यान्न में थोड़ी सुगमता आई है। यूनाइटेड नेशंस के भोजन और कृषि संगठन के अनुसार दिसंबर 2010 में अपने सबसे महंगे दौर के बाद ग्यारह महीने बाद अक्टूबर में इसमें गिरावट आई है। इसी तरह इस चलन के चलते भारत में पिछले हफ्ते खाद्य स्फीति 6.6 प्रतिशत लुढ़की है।
दूसरी आवश्यकता यह स्वीकारने की है कि यह वित्तीय नीति के उस भोथरे औजार को इस्तेमाल करने की अनुमति देता है जिसमें ब्याज दर बढ़ा कर मांग को बाधित कर दिया जाता है क्योंकि नीतिगत सुधारों में आगे बढ़ते रहने में डर रहता है।

दुर्भाग्यवश ऊंची ब्याज दर ने रियल एस्टेट कारोबार पर कोई रुकावट नहीं डाली। होम लोन की दरें पिछले साल मार्च और सितंबर 2011 के बीच 10.4 प्रतिशत से कूद कर 15.2 प्रतिशत पर पहुंच गईं। ऊंची ब्याज दर की वजह से लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों में कटौती करते हैं और ब्याज चुकाते हैं। इससे दूसरे उद्योगों के उत्पादों में खुद ब खुद कटौती हो जाती है। इस कारोबार ने दूसरे उद्योगों की मांग और आपूर्ति के गणित को गड़बड़ा दिया है। सरकार ने इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाए। उसने भी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्वायत्तता की दुहाई देकर औद्योगिक हत्या में एक तरह से मदद ही की। इस समय छोटी कंपनियां नुकसान में हैं या मारी जा रही हैं। क्योंकि बड़ी कंपनियों की पहुंच में वैश्विक पूंजी है, जो लंदन इंटर बैंक से 2-4 प्रतिशत दर के पॉइन्ट्स पर धन लेती हैं। या यह प्रतिशत जरूरत के मुताबिक 6-8 हो जाता है। यह ऐसे आंकड़े हैं, जो सिर्फ जी20 चर्चा में सिर्फ वित्तीय विकास बताने के काम आएंगे।  इस वक्त हमें रोजगार वृद्धि की जरूरत है, जो छोटी कंपनियों से ही आएगा। ये कंपनियां 13-15 प्रतिशत की ऊंची ब्याज दर पर पैसा उधार लेने के लिए मजबूर हैं। यह बताने के लिए हमें किसी विशेषज्ञ की जरूरत नहीं है, जो बताए कि पैसा उधार लो और अच्छे रिटर्न के लिए इसे भारतीय उद्योग में निवेश करो।

ऊंची मुद्रा स्फीति और ऊंची ब्याज दर, इन दोनों बाधाओं ने मिल कर पूंजी उत्पाद को 25.5 प्रतिशत तक गिरा दिया है। इसका मतलब है कि योजनाबद्ध तरीके से भविष्य में निवेश होने नहीं जा रहा। जब इन निवेशों को रोका जाता है, तब मशीन चलाने के लिए जिन लोगों की जरूरत होती है उनको काम मिलना बंद हो जाता है। पूंजी उत्पाद काम के रास्ते नहीं खोज पाते, जिसके फलस्वरूप रोजगार वृद्धि कम हो जाती है। लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। हमारे उच्च शिक्षित, उच्च प्रशिक्षित, बिलकुल स्पष्ट वित्त शास्त्री इस बात को जानते हैं और इस समय वे कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं। 

इस सबके बावजूद सुस्त एवं विफल तंत्र को गति प्रदान करने के लिए सुधार की नितांत आवश्यकता है, जो कि राजनैतिक गठबंधन की जरूरत के चलते अनुपस्थित है। ठीक है, लेकिन  क्या हम व्यापार के लिए प्लांट लगाने और अपने उत्पाद को बाजार में लाने और रोजगार के नए मौके पैदा करने के लिए भ्रष्टाचार, अत्यधिक नौकरशाही, बेकार के कानून-कायदे, नियम और नियमावलियों जैसी बाधाओं को शिथिल कर सकेंगे? इसके लिए हमें आत्मावलोकन की जरूरत होगी, जो कि दंभ के लिए एक एंटीबायोटिक और ईमानदारी के लिए एक गोली होगी। लेकिन ऐसा होने के लिए हमें धुएं के संकेत समझने होंगे, जो हमारा दम न घोंट दें। 

 

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