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ये पात-पात!

नर्सरी एडमिशन की उम्र चार साल ही रखने और बच्चों पर बस्ते का बोझ न डालने का फैसला तो सही है। लेकिन इसका क्या किया जाए कि मां-बाप और स्कूल ही इन्हें न मानने की जुगत निकालते रहते हैं। भावना यह रहती है कि बच्चा प्यारा तो है लेकिन अभी से डॉक्टर-इंजीनियर, आईएएस-आईपीएस बनने की तैयारी करे। अभिभावक की यह इच्छा हो, तो स्कूल-व्यवसाय में लगे लोग उनका शोषण क्यों न करें? वे डोनेशन के नाम पर अनाप-शनाप वसूलते हैं। बस्ता न ढोने देने का नियम इस तरह मानते हैं कि घर और स्कूल के लिए अलग-अलग किताब-कॉपी खरीद लो!

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