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सीबीआई पर अटकी सुई

लोकपाल के मुद्दे पर सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के दबाव के बावजूद सभी राजनीतिक पार्टियों ने सरकार से जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाने की अपील की है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुआई में बुधवार को हुई सर्वदलीय बैठक में लगभग पार्टियों ने कुछ शर्तो के साथ प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की वकालत की। बैठक में सरकार ने मौजूदा सत्र में लोकपाल को पारित कराने का कोई वादा नहीं किया है।

सबसे ज्यादा मतभेद सीबीआई के मुद्दे पर उभरा। भाजपा ने जहां सीबीआई को स्वायत्त बनाने की मांग करते हुए निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव की मांग रखी तो अन्य राजनीतिक दलों ने इस पर अलग राय दी। सूत्रों के मुताबिक, बैठक के बाद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि सरकार सभी पार्टियों के सुझावों पर गौर करेगी। इसके बाद ही कोई रुख तय किया जाएगा। बैठक में मौजूद एक सदस्य ने जब पूछा कि इस सत्र में लोकपाल पारित हो जाएगा तो जवाब में वित्त मंत्री ने कहा कि मौजूदा हालात में कुछ कहना मुश्किल है। हालांकि, प्रधानमंत्री ने बैठक की शुरुआत करते हुए विधेयक को इसी सत्र में पारित कराने की बात कहीं थी। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कुछ शर्तो के साथ प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की वकालत की। पर जद (यू) का तर्क है कि इससे कई तरह की गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। लेफ्ट, बसपा और सपा ने भी प्रधानमंत्री को लोकपाल के अधीन लाने का समर्थन किया।

लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान ने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने का विरोध करते हुए आरक्षण का मुद्दा भी उठाया, जिसका लगभग सभी पार्टियों ने समर्थन किया।

ग्रुप सी व डी के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने पर पार्टियों में आम राय नहीं थीं। भाजपा ग्रुप सी को लोकपाल के दायरे में लाने की पक्षधर है मगर सरकार और सीपीआई का कहना है कि इससे लोकपाल पर काम को बोझ बढ़ जाएगा। हालांकि सीपीएम सहित बाकी पार्टियां ने ग्रुप सी के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने की पुरजोर मांग की।

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