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लाख रुपये के लिए पांच घंटे बहस, खर्चा एक करोड़

अब तक हम यही पढ़ते-सुनते आए हैं कि संसद में हंगामे के कारण मुद्दे पर चर्चा नहीं हो पाई जिससे खजाने को लाखों की चपत लगी। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है। कभी-कभी जनहित से जुड़े किसी मुद्दे पर बहस इतनी लंबी खिंच जाती है कि असल मुद्दे से तुलना की जाए तो आश्चर्य होता है।

ऐसा ही रेलवे के अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान देखने को मिला। रेलवे की अनुदान मांगें सिर्फ एक लाख रुपये की थी। यानी एक लाख रुपये की राशि संसद की मंजूरी चाहिए थी। जिस पर साढ़े पांच घंटे बहस चल पड़ी। संसद में एक घंटे की बहस पर 18 लाख रुपये का खर्च आता है तथा इस हिसाब से करीब एक करोड़ रुपये इस बहस पर खर्च हुए। इसे बेहतर भी कहा जा सकता है। क्योंकि यह भारतीय लोकतंत्र की खूबी है कि संसदीय नियमों का जब पालन होता है तो कायदे से होता है। नियमों के अनुसार हर मंत्रालय को बजट दिया जाता है। यदि उससे ज्यादा खर्च हो रहा है तो बढ़ी हुई राशि की मंजूरी संसद से लेनी जरूरी है। इसे पूरक अनुदान मांग कहते हैं।

लोकसभा में मंगलवार को रेल की पूरक अनुदान पर चर्चा शुरू हुई जिसमें विपक्ष और सत्ता पक्ष के 40 से अधिक सदस्यों ने भाग लिया। पांच घंटे चलने के बाद भी यह अभी अधूरी है और रेल मंत्री इसका जवाब देंगे। इसके बाद सदन इस पर मतदान भी कर सकता है। फिर राज्यसभा में भी इसे पारित करना होगा।

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