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अनोखे कण की झलक

पहले लग रहा था कि सफलता की गुंजाइश बहुत कम बची है। यूरोपीय परमाणु शोध संस्थान (सर्न) का लार्ज ह्रेडोन कोलाइडर(एलएचसी) परियोजना विज्ञान के इतिहास की सबसे विशाल, सबसे महंगी और सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना है और इसका मुख्य उद्देश्य एक ऐसे सूक्ष्म कण का पता लगाना था, जिसका अस्तित्व वैज्ञानिकों के लिए सिर्फ सैद्धांतिक गणित में ही था। इस कण का नाम हिग्ज बोसॉन है और अगर यह नहीं मिलता, तो सूक्ष्म कणों की भौतिकी के सारे नियम उलट-पुलट जाते। लेकिन अब यह खबर आई है कि एलएचसी के दो मापक यंत्रों ने उस कण का पता लगा लिया है, जो संभवत: हिग्स बोसॉन है। अभी और प्रयोगों से  ही इस बात की शत-प्रतिशत पुष्टि हो पाएगी, लेकिन वैज्ञानिक इस सफलता से काफी उत्साहित हैं, क्योंकि यह भौतिकशास्त्र के इतिहास की सबसे बड़ी खोजों में से एक होगी। जाहिर है, हिग्ज बोसॉन का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता, तब भी यह भौतिकी के इतिहास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक होती। बोसॉन कुछ खास किस्म के सब एटॉमिक कणों को कहते हैं। इनका बोसॉन नामकरण महान भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्रनाथ बोस के नाम पर किया गया है। 1960 के दशक में अंगरेज भौतिकशास्त्री पीटर हिग्ज और उनके सहयोगियों ने हिग्ज बोसॉन की अवधारणा प्रस्तुत की। इस अवधारणा के मुताबिक विभिन्न सूक्ष्म कणों की संहति या भार इस विशिष्ट बोसॉन की वजह से होता है, यानी  हिग्ज बोसॉन के आधार पर परमाणु भौतिकी का वह मॉडल पूरा हो गया, जिसे ‘स्टैंडर्ड मॉडल’ कहते हैं और जिसके आधार पर प्रकृति में पाए जाने वाले तमाम सूक्ष्म कणों और बलों के कार्य-कारण की व्याख्या हो सकती है, सिवाय गुरुत्वाकर्षण के। सैद्धांतिक रूप से तो यह मॉडल सही था, लेकिन इसको पूरी तरह से सही तब कहा जा सकता था, जब इसकी प्रायोगिक स्तर पर भी तस्दीक हो सके।

आधुनिक भौतिकशास्त्र में सबसे मुश्किल काम प्रयोगों से कुछ सिद्ध करना है, क्योंकि हम या तो अत्यंत विराट शक्तियों और प्रकाश वर्षो के आमने-सामने होते हैं या अत्यंत सूक्ष्म कणों और सेकंड के हजारों-हजारवें हिस्से से हमारा साबका पड़ता है। इस स्तर की नाप-जोख अक्सर असंभव ही साबित होती है। हिग्स बोसॉन कोई आसानी से दिखने वाला कण नहीं  है, उसका अस्तित्व इतने कम समय के लिए होता है कि उसके आगे एक सेकंड भी युगों के बराबर लगे। फिर वह आसानी से स्वतंत्र रूप में मिलने वाला भी नहीं। इसीलिए वैज्ञानिकों ने तय किया कि सृष्टि के आरंभ यानी बिग बैंग जैसी परिस्थितियां पैदा की जाएं। एलएचसी में फ्रांस और स्विट्जरलैंड की सीमा पर धरती से 175 मीटर की गहराई में 27 किलोमीटर लंबी सुरंग है, जिसमें बहुत तेजी से सूक्ष्म कणों को आपस में टकराया जाता है। सैकड़ों बेहद सूक्ष्म संवेदी मापक हर हलचल को रिकॉर्ड करते रहते हैं और दुनिया भर में बैठे वैज्ञानिक अपने-अपने कंप्यूटरों पर इस जानकारी का विश्लेषण करते हैं। इसी प्रयोग के दौरान उन न्यूट्रिनो का पता चला था, जिनकी गति संभवत: प्रकाश की गति से भी ज्यादा तेज है। अगर हिग्ज बोसॉन न भी मिलता, तब भी इस प्रयोग से इतनी जानकारी मिल रही थी, जो वैज्ञानिकों को बरसों तक व्यस्त रखती। प्रयोग सन 2008 में शुरू हुआ था और धीरे-धीरे हिग्ज बोसॉन की खोज का दायरा सिमट गया था। वैज्ञानिक यह सोचने लगे थे कि सूक्ष्म कणों को वजनदार बनाने वाला यह कण नहीं मिला, तो फिर क्या संभावनाएं हो सकती हैं। लेकिन दो डिटेक्टरों से संकेत मिलने पर अब फिर उत्साह लौटा है। जल्द ही यह घोषणा हो सकती है कि पीटर हिग्ज ने जो सोचा था, वह सही निकला। 

 

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