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अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में बदलाव की दस्तक

सर सैयद अहमद खान ने महिला और मुस्लिम शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय यानी एएमयू की स्थापना की थी, लेकिन तालीम और तहजीब के इस इदारे में सोच फिर भी नहीं बदली। यहां पर लड़कियों का चुनाव लड़ना आसान नहीं है। चुनाव के दौरान लड़की होने और क्षेत्रवाद का दंश मैंने यहां खुद ङोला है। यहां पर सात साल तक की पढ़ाई के दौरान मैंने कई ऐसी समस्याएं देखीं, जिन्हें दूर करने की जरूरत थी। एएमयू में फंड का दुरुपयोग, वूमेंस सेल, प्लेसमेंट सेल,  लाइब्रेरी, लड़कियों के लिए मेडिकल, हॉस्टल, सीट आदि से जुड़ी कई समस्याएं हैं, जिनसे सिर्फ लड़कियों को ही नहीं, सभी छात्रों को हर रोज जूझना पड़ता है। मुझे हमेशा यह लगता रहा कि इन समस्याओं को दूर करने के लिए कुशल प्रतिनिधित्व की जरूरत है।

सर सैयद अहमद साहब के आदर्शो को जेहन में रखते हुए मैंने छात्र संघ का चुनाव लड़ने का इरादा किया। मुझे लगा कि अगर सारी समस्याओं को समाधान के रास्ते पर ले जाना है, तो अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ना चाहिए। नामांकन से पहले जब मेरा नाम चर्चा में आया, तो लोग कहने लगे कि यह लड़की है, क्या कर पाएगी? लड़की को वोट देना, वोट को बरबाद करना है। दो सौ से अधिक वोट नहीं मिल पाएंगे। इसे तो लड़कियां भी वोट नहीं देंगी। रात को जब कोई प्रॉब्लम हो जाएगी, तो कैसे यह मौके पर पहुंच पाएगी? मेरे समर्थकों को धमकियां भी दी गईं। इन तमाम बातों के बीच मैंने नामांकन दाखिल किया। मेरे साथ छात्रएं ही नहीं, छात्र भी थे। प्रचार के दौरान मेरे समर्थकों के साथ मारपीट की गई और क्षेत्रवाद का हवाला देकर मेरे वोटों को काटने की कोशिश की गई। जब फाइनल स्पीच का समय आया, तब भी मेरा काफी विरोध किया गया। कई लोगों ने इसका बायकॉट तक किया। लेकिन इस सबके बावजूद मुझे इतने वोट मिले कि मैं हारकर भी जीत गई हूं।

चुनाव में हार-जीत महत्वपूर्ण होती है, लेकिन मेरे मामले में महत्वपूर्ण यह था कि एक बहुत पुरानी जड़ता को तोड़कर किसी लड़की ने पहली बार यहां चुनाव लड़ने की कोशिश की। सिर्फ चुनाव लड़ने भर से इस विश्वविद्यालय की लड़कियों ने बहुत कुछ हासिल कर लिया है। जीत जाती, तो यह सिलसिला शायद और आगे तक जाता। मेरे साथ कोई लॉबी नहीं थी, बल्कि यूपी, बिहार, कश्मीर, राजस्थान, पूर्वी उत्तर प्रदेश के छात्र थे। मुझे लॉबी से हटकर विकास करने, क्षेत्रवाद दूर करने और शांति का माहौल लाने के लिए वोट दिया गया है। मेरी इस जंग से एएमयू में बदलाव की बयार चल पड़ी है। आने वाले समय में मेरी जैसी और भी इरम चुनाव लड़ेंगी। इस परिणाम को देखकर लड़कियों को अब कोई नजरअंदाज नहीं कर सकेगा। यह एक क्रांति हैं। कैंपस की सोच बदल रही है और महिला सशक्तीकरण का पुरजोर समर्थन कर रही है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

 

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