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धर्मबुद्धि का जागना

प्राचीन काल से ही धीरे-धीरे मनुष्य ने यह अनुभव करना प्रारंभ कर दिया  कि वह जो भी जानता और जो भी पाता है, उसके सभी कार्यो के पीछे कोई एक सत्ता है, जो कारण के रूप में क्रियाशील है। उस समय से मनुष्य इस विराट शक्ति तक पहुंचने अथवा उस पर विजय पाने की इच्छा करने लगा। इसी उत्कंठा, जिज्ञासा के कारण, पाने की इस लालसा के  कारण उसमें धर्मबुद्धि का जागरण हुआ और उससे उनके मन का विकास हुआ। यह कहा जा सकता है कि जिस दिन से उसमें धर्मबुद्धि का जागरण हुआ, मनुष्य वास्तव में मनुष्य बना। इसके पूर्व मनुष्य का जीवन अविकसित था। परम लक्ष्य की प्राप्ति के प्रयास के स्थान पर मनुष्य ने अपने विचारों और प्रयासों को विभिन्न विषय-वस्तुओं को पाने की ओर लगा दिया और वह परम पुरुष से मुझे यह दो-वह दो, मेरे शत्रुओं का नाश करो, जैसी प्रार्थनाएं करने लगा।  इसके बाद मनुष्य ने प्रश्न किया कि आखिर वास्तव में मैं क्या चाहता हूं? क्या मैं उस सत्ता से अधिक जानता हूं, जो मुझसे हजारों-हजार गुणा अधिक जानती है।

मनुष्य के मस्तिष्क की क्षमता क्या है? उसमें भी कितनी क्षमता उसकी पकड़ में है?  वह सत्ता, जो मनुष्य का ईष्ट है, वह उन मनुष्यों की शक्ति ही तो नहीं है। उनकी मेधा मनुष्यों की मेधा से अधिक शक्तिशाली है। मुझे जो वास्तव में चाहिए, उसे वे मुझसे अधिक अच्छी तरह जानते हैं। एक, दो या तीन महीने का शिशु यह नहीं जानता कि उनकी आवश्यकता क्या है। उसकी माता उसकी आवश्यकता के विषय में सबसे अधिक जानती है- सब कुछ जानती है। शिशु मात्र रोता है और उसे अपने कर्तव्य के प्रति सचेष्ट कर देता है। उसकी माता का कर्तव्य क्या होता है, इसे वह शिशु नहीं जानता है, किंतु वह यह जरूर चाहता है कि मां अपना कर्तव्य करे। ठीक उसी तरह, परम- पुरुष को पता है कि उनका हम सभी के प्रति क्या कर्तव्य है।

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