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सफीरों का सम्मेलन

इस्लामाबाद में सफीरों (राजदूतों) की बैठक दो दिन तक चली। इसमें 16 देशों में तैनात पाकिस्तानी नुमाइंदों ने शिरकत की। अमेरिका, यूरोप, अफगानिस्तान व भारत में नियुक्त पाकिस्तानी राजदूत भी बैठक में शामिल हुए। राजदूतों ने मुल्क की विदेश नीति की समीक्षा की। राजदूत सिफारिशों के साथ आए थे, जिन्हें वजीर-ए-आजम गिलानी को सौंपा गया। इन सिफारिशों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी संसदीय समिति के हवाले किया जाएगा। यही समिति पाकिस्तान में नाटो की कार्रवाई पर विस्तृत रिपोर्ट बना रही है। अमेरिका, नाटो व अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहयोग बल (आईएसएएफ) से पाकिस्तान के रिश्ते कैसे हों, इस पर यह समिति विचार करेगी। फिर उसकी सिफारिशों पर पार्लियामेंट की संयुक्त बैठक में विचार किया जाएगा। वैसे जलसे के आखिरी सत्र के पीएम के संबोधन को अगर इसे कोई संकेत मानें, तो लगता है कि हुकूमत के फैसलों पर राजदूतों ने अपना भरोसा जताया है। गौरतलब है कि नाटो की हवाई कार्रवाई के बाद हुकूमत ने कुछ सख्त कदम उठाए। वजीर-ए-आजम ने भाषण में साफ कहा है कि अमेरिका, नाटो या आईएसएएफ को इज्जत बख्शते हुए हम मदद कर रहे थे, पर किसी भी सूरत में हमारी सरहदों के अंदर हमले को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस बैठक का सार यही रहा कि सफीरों ने नाटो की रसद सामग्री आपूर्ति के रास्ते बंद करने को जायज ठहराया है। नाटो से शम्सी एयरबेस खाली कराना और बॉन सम्मेलन में हिस्सा नहीं लेने के फैसले को सही बताया गया। पाकिस्तान ने नाटो कार्रवाई की अमेरिकी जांच को पहले ही ठुकरा दिया है। पर वजीर-ए-आजम ने उम्मीद जताई है कि अमेरिकी जांच सही नतीजे पर पहुंचेगी और इससे उन सवालों के जवाब मिलेंगे, जिन्हें पाकिस्तान ने उठाया है। पाकिस्तान का मानना है कि हमला जानबूझकर किया गया था। आईएसआई के मुखिया जनरल शुजा पाशा ने ऐसा ही कहा है। अमेरिका की अगुवाई में हो रही जांच की शुरुआती रिपोर्ट 23 दिसंबर तक आएगी। अगर यह रिपोर्ट पाकिस्तान के नजरिये से अलग होती है, तो आने वाले वक्त में पाकिस्तान-अमेरिकी रिश्ते और बिगड़ेंगे। अब गेंद अमेरिका के पाले में है।
द न्यूज, पाकिस्तान

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