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बिहारी जज्वा और स्वाभिमान देखना है तो इनसे मिलिए

पटना। आशीष कुमार मिश्र। बिहारी कर्मठता और स्वाभिमान दोनों एक साथ देखना हो तो रामदेव प्रसाद से एक मुलाकात काफी है। हमउम्र तो छोडिम्ए, नौजवान भी इनकी फुर्ती और मेहनत देखकर हैरान हो जाते हैं। 85 साल के इस वरीय नागरिक से मिलना ही ऊर्जा भर देता है। इस उम्र में भी रामदेव असल मायने में परिवार के मुखिया हैं। छह जान की परवरिश अब भी इन्हीं के बूते चल रहा है।

32 साल का इकलौता बेटा 7 साल पहले डायरिया से गुजर गया अपनी विधवा और तीन बच्चों को छोड़कर। आमतौर पर घर के वयोवृद्ध घर के किनारे वाले कमरे में शोभा की वस्तु की तरह रामनाम जपते-जपते अपनी अंतिम पारी खेलते हैं। लेकिन रामदेव जी की फितरत तो देखिए। पटना से सटे नत्थोपुर, परसा गांव से सुबह 7.15 बजे ट्रेन पकड़कर पटना आते हैं। कई बार ट्रेन छूटने पर पैदल ही पटना तक नाप देते हैं।

इंटरमीडिएट काउंसिल से सटे मौर्यलोक वाली गली में इनकी पान की गुमटी है। शाम तक दुकानदारी करने के बाद फिर परसा वापसी। यह बिना नागा चलता है। ब्रिटिश राज में में चौथी कक्षा पास रामदेव बढिम्या हिन्दी और शुद्ध मगही में बात करते हैं। ‘भूकंप जे होलई हल बाबू 1934 वाला त हम 7-8 साल के हलिक। 1948 से पान दुकान चलाते हैं। आप समझिए तब छह आना कमा लेते थे।

आजादी के बाद पहली बार जवाहर लाल नेहरू पटना आए थे, एकदम याद है।’ रामदेव जी ने कहा कि एक जमाना वह था, बाबूजी 7 रुपए महीना कमाते थे और 11 आदमी का परिवार मजे में चलता। पर 75 से 100 रुपए रोज कमाने पर भी अब घर बमुश्किल चल रहा है। कभी रोटी-नमक तो कभी मांड़-भात खाकर।

पत्नी को 200 रुपए पेंशन पांच-छह महीने पर मिल जाता है। पर तीन-चार बार आवेदन देने पर भी उन्हें पेंशन नहीं मिला। डीएम के दरबार में भी गए। कुछ नहीं हुआ। इधर पतोहू आंगनबाड़ी में लग गई है। पांच-छह महीने पर 1500 रुपए मिल जाते हैं।

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