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रुपये का सस्ता होना

जब बाजार में हर चीज महंगी मिलने लग, तो इसका एक अर्थ यह भी होता है कि रुपये की कीमत गिर रही है। रुपये की कीमत में यह गिरावट तो हम हर रोज देख रहे हैं, बिना एक्सचेंज मार्केट का हाल जाने। जब किसी मुद्रा की कीमत गिरती है, तो वह गली, मोहल्ले या शहर के बाजार में ही नहीं गिरती, वह पूरी दुनिया के बाजारों में गिरती है। हालांकि दुनिया भर के मुद्रा बाजारों में इस समय रुपये की जो कीमत गिर रही है, उसका आखिरी कारण हमारे बाजारों की महंगाई है। पहले कुछ कारण दूसरे हैं, जिनकी वजह से जो अमेरिकी डॉलर पहले तकरीबन 46 रुपये में आ जाता था, वह इस समय 53 रुपये से भी ज्यादा पर मिल रहा है। इसके दो बड़े कारण तो बहुत साफ हैं। एक कारण है यूरोप का संकट। वहां की अर्थव्यवस्थाओं की तरह ही वहां की मुद्राएं भी संकट में हैं, इसलिए यूरोप के पैसे वाले इस समय अमेरिकी डॉलर में निवेश कर रहे हैं। जाहिर है कि डॉलर की मांग ज्यादा है, तो वह महंगा तो होगा ही। दूसरा कारण यह है कि हमारे बाजार में निवेश के तौर पर जो डॉलर आता था, उसमें भी कमी आई है। काफी समय से कहा जा रहा है कि भारतीय बाजार में निवेश को बढ़ाना है, तो हमें आर्थिक सुधारों के अगले दौर की ओर बढ़ना होगा। लेकिन ये सुधार किसी न किस वजह से अटके पड़े हैं। मसलन, अगर खुदरा व्यापार में एफडीआई का रास्ता साफ होता, तो कुछ विदेशी मुद्रा और आ जाती, लेकिन यह हो नहीं सका। भारतीय बाजार में डॉलर की कम आमद ने भी रुपये के मुकाबले डॉलर की कीमत को बढ़ा दिया है। तीसरा कारण थोड़ा किताबी है, जिसे इन्फ्लेशन डिफरेंशियल यानी मुद्रास्फीति का अंतर कहते हैं, जिसका अर्थ है कि हमारे बाजार में अगर महंगाई काफी तेजी से बढ़ रही है और उनके बाजार में कम तेजी से, तो दीर्घकाल में हमारी मुद्रा की कीमत गिरेगी ही। महंगाई भले ही रुपये की कीमत गिरने का बहुत बड़ा कारण न हो, लेकिन रुपये की कीमत गिरने से महंगाई तो बढ़ती ही है। क्योंकि इससे पेट्रोलियम पदार्थो का आयात महंगा हो जाता है, फिर पेट्रोल की बढ़ी कीमत पूरे बाजार पर अपना असर दिखाती है। रुपये की कीमत गिरने का एक फायदा जरूर होता है कि इससे निर्यात बढ़ जाता है, क्योंकि डॉलर के मूल्य में हमारा माल विश्व बाजार में सस्ता हो जाता है। लेकिन इस बार ये संभावनाएं भी ज्यादा नहीं हैं, क्योंकि ज्यादातर विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाएं बुरी हालत में हैं और ये देश आयात से बच रहे हैं।

इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए सरकार के पास बहुत ज्यादा हथियार है भी नहीं। आर्थिक सुधार वाले रास्ते पर राजनैतिक बाधाएं बहुत बड़ी हैं। दूसरा तरीका यह सुझाया जा रहा है कि रिजर्व बैंक बाजार में हस्तेक्षप करे। यानी वह अपने विदेशी मुद्रा कोष में रखे डॉलर के खजाने को बाजार में बेचे। वहां डॉलर की उपलब्धता बढ़ेगी और इसके मुकाबले रुपये की घटेगी, तो यह सिलसिला कुछ हद तक रुक सकता है। यही सुझाव एक दूसरे ढंग से यूं भी दिया जा रहा है कि अभी तक डॉलर की सबसे ज्यादा नियमित मांग वाली पेट्रोलियम कंपनियां अपने आयात के लिए बाजार से डॉलर खरीदती हैं, बजाय इसके अगर वे रिजर्व बैंक से डॉलर खरीदें, तो रुपये की गिरावट को रोका जा सकता है। इससे बाजार से डॉलर का सबसे बड़ा खरीदार कम हो जाएगा। लेकिन समस्या यह है कि विदेशी मुद्रा कोष आपात स्थिति के लिए जमा खजाना होता है और मुद्रा बाजार की उथल-पुथल के चलते उसे खाली करना बुद्धिमानी नहीं है। खासकर तब, जब सारी दुनिया डॉलर में निवेश कर रही हो और हम उसे खाली करना शुरू कर दें। अर्थव्यवस्था के इस मोर्चे पर दुविधा ही दुविधा है।

 

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