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बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है ऊर्जा संरक्षण

ऊर्जा किसी राष्ट्र की प्रगति, विकास व खुशहाली का प्रतीक होती है और खुशहाली की यह राह ही ऊर्जा संकट तक भी जाती है। आज ऊर्जा के असंतुलित और अत्यधिक उपयोग के कारण जहां एक ओर ऊर्जा खत्म होने  की आशंका प्रकट हो गई है, वहीं दूसरी ओर मानव जीवन, पर्यावरण, भूमिगत जल, हवा, पानी, वन, वर्षा सभी के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता बाल्टर कान का कहना है कि वैश्विक ऊर्जा में 60 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले तेल और प्राकृतिक गैस का कुल उत्पादन 10 से 30 साल बाद चरम पर होगा, उसके बाद उनमें तीव्र गिरावट आएगी। यानी इनके विकल्प तलाशने का समय आ गया है।

भारत की दिक्कत यह है कि वह जीवाश्म ईंधन यानी पेट्रोल, डीजल, गैस, कोयले आदि में आत्मनिर्भर नहीं है। बाकी दुनिया में भी यह ईंधन काफी तेजी से कम होता जा रहा है। वह भी उस दौर में, जब ऊर्जा की हमारी जरूरतें बहुत तेजी से बढ रही हैं। दूसरी तरफ, 10वीं पंचवर्षीय योजना में 41,000 मेगावाट अतिरिक्त विद्युत उत्पादन के लक्ष्य के मुकाबले मात्र 21,200 मेगावाट उत्पादन ही हो पाया। 11वीं योजना में 78,577 मेगावाट अतिरिक्त उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था, जिसे संशोधित कर 62,375 मेगावाट कर दिया गया। हर अगली पंचवर्षीय योजना में हमें ऊर्जा उत्पादन को लगभग दोगुना करते जाना होगा। मांग और आपूर्ति में जो अतंर है, वह कभी घटेगा, ऐसा संभव नहीं लगता।

ऐसे में, ऊर्जा उत्पादन, उपलब्ध ऊर्जा का संरक्षण और ऊर्जा को सही दिशा देना जरूरी है। ऊर्जा को बचाने के लिए हमेशा छोटे कदमों की जरूरत होती है, जिनके असर बड़े होते हैं। मसलन, पूरे प्रदेश में बिजली की बचत वाले सीएफएल बल्ब लगाने के केरल सरकार के अभियान से ऊर्जा संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल होने का अनुमान है। इसके तहत पूरे प्रदेश में सीएफएल बल्ब वितरित किए गए हैं। 95 करोड़ रुपये की इस प्रदेशव्यापी योजना से 520 मेगावाट बिजली की बचत की उम्मीद है। योजना पर अमल से केरल में इस बार बिजली की अधिकतम मांग वाले समय में भी कोई लोड शेडिंग नहीं हुई। कुछ ऐसा ही प्रयोग हिमाचल प्रदेश में भी हुआ है। वहां परंपरागत बल्ब के बदले सीएफएल वितरित करने की योजना बनी और आप को दूर-दराज के गांवों में भी सीएफएल जलते दिख जाएंगे। हिमाचल एक पावर सरप्लस राज्य है। यानी ऐसा राज्य, जो अपनी जरूरतों से ज्यादा बिजली पैदा करता है और उस बिजली को वह दूसरे प्रदेशों को बेचता है। इसीलिए सीएफएल योजना से प्रदेश को दोहरा लाभ हुआ है। केरल और हिमाचल की इन कोशिशों से बाकी राज्य भी सबक ले सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा संरक्षण उपायों से देश भर में 25,000 मेगावाट बिजली की बचत की जा सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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