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भोजपुरी सिनेमा में बदलाव

भोजपुरी फिल्मों की गति और स्थिति के बारे में हम सभी जानते हैं। इसी साल फरवरी में स्वर्णिम भोजपुरी समारोह हुआ। इसमें पिछले पचास सालों के इतिहास की झलक देखते समय सभी ने ताजा स्थिति पर शर्मिदगी महसूस की। अपनी क्षमता और लोकप्रियता के बावजूद भोजपुरी सिनेमा फूहड़ता के मकड़जाल में फंसा हुआ है। अच्छी बात यह है कि भोजपुरी सिनेमा के दर्शकों का एक बड़ा वर्ग है। बुरी बात यह है कि भोजपुरी सिनेमा में अच्छी संवेदनशील फिल्में नहीं बन रही हैं। निर्माता और भोजपुरी के पॉपुलर स्टार प्रयोग के लिए तैयार नहीं हैं और मानकर चल रहे हैं कि भोजपुरी सिनेमा के दर्शक स्वस्थ सिनेमा पसंद नहीं करेंगे। पिछले दिनों रामधारी सिंह दिवाकर की कहानी ‘मखान पोखर’ पर बनी फिल्म ‘सैंया ड्राइवर बीवी खलासी’ रिलीज हुई। इस फिल्म का शीर्षक आम भोजपुरी फिल्म का एहसास देता है। मखान पोखर में रेणु के बाद के उत्तर बिहार के समाज की आंचलिक झलक है। खबर है कि इस फिल्म को भोजपुरी सिनेमा के आम दर्शक ने अधिक पसंद नहीं किया, लेकिन इसे कुछ नए दर्शक मिले। साथ ही भोजपुरी के उन नियमित दर्शकों को संतुष्टि हुई, जो बेहतरीन सिनेमा की आस में थे। मैंने हाल ही में देसवा देखी। देसवा को आरंभिक रूप में देख चुके कुछ मित्रों ने पसंद नहीं किया था। अभी देसवा जिस रूप में प्रदर्शित हो रही है, वह अपनी सीमाओं के बावजूद आशान्वित करती है कि भोजपुरी में बेहतर सिनेमा की उम्मीद खत्म नहीं हुई है।   
चवन्नी चैप में अजय ब्रह्मत्मजा

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