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लीबिया के चिंताजनक हालात

लीबिया को एक लोकतांत्रिक देश की शक्ल देने की कवायद त्रिपोली में नाकाम होती दिख रही है। यह मुल्क अब भी कोशिश कर रहा है कि सड़कों से तमाम असलहे और घातक हथियार काबू में लिए जाएं। अब नागरिक सेनाएं वहां आपस में लड़ रही हैं। लीबिया में घरेलू जंग को खत्म हुए लगभग सात हफ्ते बीत चुके हैं, लेकिन देश के नए सियासी नेतृत्व को अब भी अपनी अथॉरिटी कायम करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है और वह गृह युद्ध के दौरान पैदा हुई नागरिक सेनाओं को काबू में करने के लिए जूझ रहा है। गौरतलब है कि ये जंगजू दस्ते नए नेतृत्व के आगे समर्पण करने को तैयार नहीं हैं। अगस्त महीने में त्रिपोली के बाहर की जिन नागरिक सेनाओं का बढ़-चढ़कर स्वागत किया गया था और उन्हें आजादी दिलाने वाले रहनुमा के तौर पर देखा गया था, अब उनसे ही हिंसक झड़पें रोजाना की बात हो गई है। सुरक्षा ढांचा नहीं होने के कारण जगह-जगह आपसी मुठभेड़ हो रही हैं। खासकर मिसराता और जिंता जैसे शहरों के हथियारबंद दस्ते अब भी त्रिपोली में काफी ताकतवर हैं और वे शहर छोड़कर जाने को तैयार नहीं हैं। हथियारों पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं होने से हालात अधिक फिक्र पैदा करने वाले हो गए हैं। जो भी ताकतवर दस्ता है, वह अपने से कमजोर को कुचल रहा है। पिछले दिनों लीबिया के राष्ट्रपति मुस्तफा अब्दुल जलील ने तमाम पक्षों से यह गुजारिश की थी कि वे मुल्क की एकता के लिए काम करें, लेकिन उनकी अपील के कुछ घंटे के अंदर ही अज्ञात हमलावरों ने हवाई अड्डे की सुरक्षा में लगे जवानों पर हमले कर दिए। लीबियाई राष्ट्रपति पहले ही यह कह चुके हैं कि जिन लोगों के पास हथियार है, उनमें से 75 प्रतिशत बेरोजगार हैं। सरकार इन बंदूकधारियों से शहरों को आजाद कराने की हर मुमकिन कोशिश कर रही है और उसने तमाम पक्षों को चेतावनी दी है कि वे 20 दिसंबर तक देश की सत्ता को कबूल करें या फिर अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहें। जाहिर है, सत्ताधारी कौंसिल को अपनी पकड़ व्यापक करने और तमाम लड़ाकू दस्तों को एक छतरी के नीचे लाने के लिए परिश्रम करने की जरूरत है।
द पेनिनसुला, कतर

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