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दर्द में न बीतें सर्दियां

दर्द से पीड़ित लोगों के लिए सर्दियां बड़ी बेदर्द बन जाती हैं। जैसे-जैसे ठंड बढ़ती है, दर्द भी बढ़ने लगता है। विशेषज्ञों का मानना है कि दर्द से राहत पाने के लिए खुद से पेन किलर या साधारण एस्प्रिन दवाएं खा लेना, कई अन्य बीमारियों को जन्म देता है। कौन से दर्द करते हैं सर्दियों में ज्यादा परेशान और पेन मैनेजमेंट सेंटर में कैसे होता है उपचार, बता रही हैं निशि भाट

सर्दियां वैसे तो खाने-पीने और घूमने-फिरने का मौसम माना जाता है, लेकिन दर्द के मामले में यह मौसम बड़ा बेदर्द है। क्रॉनिक दर्द ही नहीं, इस मौसम में न्यूरोपैथिक दर्द के शिकार मरीजों की संख्या भी बढ़ जाती है, जिसमें शरीर में खून की आपूर्ति करने वाली नसों में संकुचन बढ़ जाता है। इस दर्द का एक प्रमुख उदाहरण माइग्रेन है, जो युवाओं को भी शिकार बना सकता है। अगर सर्दी में आपको किसी भी तरह के दर्द का सामना करना पड़ता है, तो इसे केवल पेन किलर या साधारण एस्प्रिन खाकर दूर करने की कोशिश न करें। दर्द के बढ़ते मामलों के कारण पेन मैनजमेंट सेंटर्स का महत्व भी बढ़ गया है, जो दर्द के सटीक कारणों का पता लगाकर इलाज शुरू करते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि दर्द का इलाज करने वाले 80 प्रतिशत डॉक्टर पेन किलर को दर्द का इलाज नहीं बताते हैं। दर्द के स्थायी कारणों को ध्यान में रखकर उपचार करना सबसे बेहतर माना जाता है। जानते हैं ऐसे दर्दो के बारे में जिनकी समस्या सर्दियों में बढ़ जाती है-

न्यूरोपैथिक दर्द
दिमाग का दर्द: मानव शरीर में नसें इलेक्ट्रिक वायर की तरह जुड़ी होती हैं, जो किसी भी हिस्से में दर्द या फिर चोट का संदेश तुरंत मस्तिष्क को पहुंचाती हैं। शरीर के सभी हिस्सों में फैली इन नसों के क्षतिग्रस्त होने, खून का संचालन बाधित होने या फिर नस फटने के कारण दर्द होता है। न्यूरोपैथिक दर्द की श्रेणी में साइटिका, डायबिटिज, कैंसर, स्पाइनल कॉर्ड इंजरी, दुर्घटना के बाद होने वाला दर्द, डिस्क की समस्या, स्ट्रोक और घाव या जख्म का दर्द शामिल है। सर्दियों में वातावरण में ऑक्सीजन की कमी होने के कारण नसों में संकुचन बढ़ जाता है, जिससे नसों में खून का बहाव अपेक्षाकृत कम होता है, यह स्थिति माइग्रेन और ट्रीजेमिनल न्यूरोग्लिया का भी कारण बन सकती है।

चेहरे में भी होता है दर्द
सर्दियों में 30 से 40 प्रतिशत लोगों को चेहरे के एक हिस्से में दर्द की समस्या होती है, यह एक विशेष प्रकार के ट्रीजेमिनल न्यूरोग्लिया (टीएन) की वजह से हो सकता है, जिसमें चेहरे और आंख के नीचे की मांसपेशियों में खून जमने लगता है, कई लोगों का दर्द  की वजह से चेहरा विकृत भी हो जाता है। सुबह और शाम यह दर्द अधिक परेशान करता है।  टीएन दर्द आंखों की भौहें से होता हुआ माथे तक असहनीय पीड़ा देता है। माथे व आंखों को जोड़ने वाले ट्रीजेमिनल नस के प्रभावित होने के कारण इसे ट्रीजेमिनल न्यूरोग्लिया दर्द कहते हैं। टीएन (ट्रीजेमिनल न्यूरोग्लिया)  के शुरुआती लक्षण अधिक थकान, ऊर्जा की कमी, एकाग्रता की कमी, अत्यधिक संवेदनशील त्वचा, खुजली, जलन का एहसास आदि प्रमुख हैं। दर्द का कारण पता लगने के बाद ही न्यूरोपैथिक दर्द के इलाज का क्रम शुरू किया जाता है, विशेष तरह की न्यूरोपैथिक पेन ड्रग्स, स्पाइनल कॉर्ड स्विचयुमूलेटर इंप्लांट आदि शामिल हैं। न्यूरोपैथिक दर्द के लक्षण पेरिफेरल वस्कुलर डिजीज से मिलते हैं।

टीएन का इलाज: दर्द के इलाज का दावा करने वाले 90 प्रतिशत डॉक्टर टीएन को नहीं पहचान पाते हैं, लेकिन एक बार पहचान होने के बाद मरीज को दर्द से छुटकारा दिलाया जा सकता है। एंटी कांवोलुसेंट, ट्राइसाइक्लिक आदि दवाओं से मरीज को आराम नहीं मिलता है। रेडियो फ्रीक्वेंसी, गामा नाइफ सजर्री के जरिए अति सूक्ष्म मैक्जिलरी फेशियल से नसों के संकुचन को दूर किया जाता है। इसके अलावा, बायोफीडबैक, एक्यूपंक्चर, विटामिन थेरेपी, न्यूट्रिशनल थेरेपी और इलेक्ट्रिकल शॉट्स से भी नसों में रक्त के प्रवाह को सुचारू करने की कोशिश की जाती है।

दिल की धमनियों का दर्द
दिल की धमनियां के दर्द को  पेरिफेरल वास्कुलर डिजीज (पीवीडी) कहा जाता है। हृदय से जुड़ने वाले शरीर के आंतरिक अंग और मस्तिष्क को खून पहुंचाने वाली धमनियों में खून बाधित होने से भी दर्द होता है। दर्द की पहचान के आधुनिक तरीकों से यह पता चलता है कि धमनियों का काम दिल में ही नहीं शरीर के किसी भी हिस्से में अवरुद्ध होने पर हृदयघात हो सकता है, जिन्हें एन्यूरिज्म या एथेलोरोस्केलोसिस कहा जाता है। पीवीडी की स्थिति अचानक नहीं पैदा होती है, अधिक वसा, अनियमित खानपान और व्यायाम की कमी के कारण धमनियों का आतंरिक घेरा छोटा होने लगता है। डायबिटिज व उच्च रक्तचाप के मरीजों में एथेलोरोस्केलोसिस की स्थिति के कारण कई बार पैर काटने तक की नौबत आ जाती है, जिसे क्रिटिकल लिंब एस्चेमिया कहते हैं।

पीवीडी का उपचार:  दिल व मस्तिष्क से जुड़ने वाली किस धमनी में रक्तप्रवाह बाधित हुआ है, इसका पता लगने के बाद एंटी इंफ्लेमेटरी व स्टेरॉयड दवाओं से संकुचन को दूर करने की कोशिश की जाती है। इसके विपरीत जिन मरीजों को असहनीय दर्द होता है, उन्हें नार्कोटिक्स दवाओं से भी ठीक किया जाता है, जबकि नॉन सजिर्कल इलाज में स्पाइनल कार्ड सिचुमूलेशन भी एक विकल्प है, जिसमें इसमें इलेक्ट्रोड के माध्यम से दर्द से प्रभावित जगह पर मरीज को इलेक्ट्रिल झटके दिए जाते हैं, पैरों की पेरिफेरल नसों के लिए एससीएस का इलाज कारगर माना गया है। विशेषज्ञों  की मदद से पीवीडी के कारण पैरों में होने वाले दर्द के इलाज के लिए टीसीपीओटू (ट्रांसकॉशन ऑक्सीजन टेंशन) से भी ठीक किया जाता है।

हड्डियों का दर्द
सर्दियों में हड्डियों का दर्द बढ़ जाता है। कमजोर हड्डियां गर्मियों में भले ही परेशान न करें, लेकिन सर्दियां आते ही कमजोर हड्डियों का असर जोड़ों में दर्द के रूप में सामने आता है, जिसमें महिलाओं में होने वाला ऑस्टियोपोरोसिस, रिहृयुमेटॉयड आर्थराइटिस और आर्थराइटिस, टेल बोन पेन आदि शामिल हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक देश में 50 साल से अधिक आयु की प्रत्येक दो महिलाओं में एक महिला ऑस्टियोपोरोसिस की शिकार है, इस हिसाब से 80 प्रतिशत महिलाओं की हड्डियां कमजोर हैं। हल्का सा झटका हड्डियों में फ्रैक्चर दे सकता है। युवाओं में हड्डियां कमजोर होने से कलाई का फ्रैक्चर अधिक होता है। इसे चिकित्सक हड्डियों का साइलेंट किलर मानते हैं। जेनेटिक फैक्टर के कारण महिलाओं को ऑस्टियोपोरोसिस होने का खतरा अधिक रहता है, जिसमें मीनोपॉज एक अहम वजह है। हालांकि कैल्शियम, विटामिन-डी थ्री, विटामिन-के टू, बायोफॉस्फेट और कैलसिटोनिन आदि दवाएं फ्रैक्चर व दर्द को कम करती हैं। सजिर्कल इलाज के अलावा ऑस्टियोपोरोसिस में हार्मोन रिप्लेसेमेंट थेरेपी व सेलेक्टिव एस्ट्रोजन रिसेप्टर मॉडय़ूलेटर या सीरम थेरेपी भी इस्तेमाल की जाती है।

टेल बोन पेन
गर्दन से कूल्हे को जोड़ने वाली मेरुदंड के निचले हिस्से में होने वाले दर्द को टेल बोन पेन कहते हैं। चिकित्सीय भाषा में यह दर्द कोकायागोडायना कहते हैं। कमजोर लोगों में यह दर्द अधिक देखा गया है, जिसमें बैठते हुए कूल्हे के ऊपरी हिस्से में दर्द का अनुभव होता है। कई मामलों में एक ही जगह बैठे रहने पर भी टेल बोन की समस्या देखी गई, जबकि कई बच्चों जन्म के समय टेल बोन में हल्की विकृति होने के कारण आजीवन इस दर्द से परेशान रहते हैं। मसाज  थेरेपी, दवा तेल, बायोफीडबैक आदि के अलावा कई सूक्ष्म सजर्री से भी टेल बोन पेन का इलाज किया जाता है। टेल बोन का पेन जब पेल्विक पेन (पेट के निचले हिस्से में दर्द) का कारण बन जाता कोकायडेक्टमी विधि से इलाज किया जाता है।

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  • Web Title:दर्द में न बीतें सर्दियां