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ईश्वर का बहुत दूर दिखना एक भुलावा है

वेद कहता है-‘दूरत् दूरेय अन्तिकेत्ता।’ इसका अर्थ है- नहीं जानने पर जो बहुत दूर है, वही जानने पर अत्यंत निकट है और आपके अन्त:करण में ही है।

इसके उदाहरणार्थ एक कहानी है। विवाह योग्य एक लड़की थी। उसके लिए उसके माता-पिता ने एक वर चुना। प्राचीन परम्परा के अनुसार वह विवाह संबंधियों की प्रथम पंक्ति में था। पर लड़की ने सभी में उत्तम व्यक्ति से विवाह करने का संकल्प किया। अत: माता-पिता ने उसे अकेले छोड़ दिया।

लड़की ने सोचा, राजा हर व्यक्ति से बड़ा, उच्चतर है। वह राजा को छोड़कर किसी अन्य से विवाह नहीं करेगी। और वह राजा के पीछे लगी रही। राजा एक दिन पालकी पर जा रहे थे और रास्ते में एक संन्यासी से भेंट हुई। राजा पालकी से उतर गये, उस पुण्यात्मा को प्रणाम किया और अपनी राह चल दिए।

लड़की देख रही थी। वह सोचने लगी, ‘मैं कितनी बेवकूफ हूं कि मैं समझती हूं कि राजा मनुष्यों में सबसे बड़े, उच्चतम हैं। मैं किसी तरह इसी पवित्रत्मा संन्यासी से विवाह करूंगी।’ यह सोचकर वह संन्यासी के पीछे लग गई।

एक दिन जब वह संन्यासी के पीछे-पीछे चल रही थी, तो उसने देखा कि संन्यासी वट-वृक्ष के नीचे एक गणेशजी की मूर्ति को प्रणाम कर रहे हैं। तब उसने अपना निर्णय बदल दिया और निर्णय किया कि वह भगवान गणेश से विवाह करेगी, क्योंकि उसने उन्हें संन्यासी से बड़ा पाया।

वह संन्यासी के पीछे-पीछे चलने के बदले, गणेशजी के निकट बैठ गई। जहां मूर्ति रखी थी, वहां बहुत अधिक लोग नहीं आते थे। वहां मंदिर नहीं था, सिर्फ वृक्ष की जड़ थी। अत: वहां से गुजर रहे एक आवारा कुत्ते ने उस मूर्ति को अपवित्र कर दिया। तब उस लड़की ने सोचा कि कुत्ता अवश्य ही मूर्ति से बड़ा है और वह कुत्ते के पीछे दौड़ने लगी।

तब वहां से गुजरते हुए एक नटखट लड़के ने उस कुत्ते पर एक पत्थर फेंका। वह दर्द से भौंकने लगा और भाग गया। वहां खड़ा एक नवयुवक यह सब देख रहा था। उसने उस नटखट लड़के को उस मूक प्राणी के प्रति निर्दयता करने हेतु दंड दिया।

अंतत: उस लड़की ने सोचा कि जिस नवयुवक ने उस लड़के को पीटा, वही सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए। उसने उस नवयुवक से विवाह करने का निर्णय लिया। वह नवयुवक वही निकला, जिसे उसके माता-पिता ने पसंद किया था। इस प्रकार उस लड़की ने जिसे दूर समझा था, वह निकट निकला।

आप परमात्मा की खोज में सम्पूर्ण देश में भ्रमण कर रहे हैं जैसे वे बहुत ही दूर हैं। जब तक वह जाने नहीं जाते हैं, तब तक निश्चित रूप से दूर हैं। किसी प्रकार की खोज भी उन्हें प्रदर्शित नहीं करेगी। वस्तुत: वे आपके बहुत ही निकट स्थित हैं।

वेद कहता है— दूर से भी दूर लेकिन निकटतम से भी निकट। पृथ्वी आकाश से क्षितिज पर मिलती दिखाई पड़ती है और मान लें कि उस जगह एक ताड़ का वृक्ष दिखाई पड़ता है। जहां हम खड़े हैं वहां से यह मालूम पड़ता है कि अगर आप उस स्थान पर पहुंच जाएं, तो हमें पृथ्वी आकाश से मिलती दिखाई पड़ेगी।

पर वस्तुत: उस स्थान पर पहुंचने पर, क्षितिज बहुत दूर चली गई दिखाई पड़ेगी। जैसे-जैसे हम इसकी ओर चलते जाएंगे वैसे-वैसे वह भी हमसे दूर होती जाएगी। अगर रास्ते में हमने पहचान के लिए किसी ताड़ के वृक्ष को चिह्न्ति भी किया हो, तो भी हम उस रास्ते से हो कर क्षितिज तक नहीं पहुंचते। अत: ईश्वर जिन्हें ‘तत्’ रूप में बताया जाता है, यानी जो बहुत दूर है, आपके बेहद निकट, यानी आप में ही है। वेद आपको इस बात का अनुभव कराता है। ‘तत् त्वमसि’ वेदों  का सर्वोपरि संदेश है ‘आप वहीं हैं।’ यहां ‘तत्वं’ का अर्थ ‘तत्’ होने का गुण नहीं है।

वह ज्ञान जो आप ‘मैं’ स्वरूप समझते हैं, वह परमात्मा का साक्षात्कार होना है। अगर आप में समझ का यह प्रकाश न हो, तो आप ईश्वर कहे जाने वाले तत्व को सोच भी नहीं सकते हैं। ज्ञान का उद्भव मुझसे होता है, चिन्तन मुझमें जागृत होता है। चिंतन से उत्पन्न यह ज्ञान और ‘तत्’ जो आप समझते हैं बहुत दूर है, एक ही है। वेद का सार तत्व यही है।
(कांची कामकोटि पीठम् के ब्रह्मलीन शंकराचार्य)

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