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क्योंकि हम आत्मा हैं

बहुत समय पहले की बात है, अष्टावक्र नामक एक शक्तिशाली ऋषि थे। वे आठ भागों में टेढ़े थे। इसलिए जब वे चलते थे, तो उनकी चेष्टाएं अत्यन्त विचित्र और बेढंगी प्रतीत होती थीं। इसके साथ ही वे बड़े कुरूप भी थे। साधारण लोग उन्हें देखकर हंसते थे। बाहरी दृष्टि से वक्र और विचित्र होने पर भी उनका हृदय अत्यन्त पवित्र था, क्योंकि उन्होंने अपने नित्य स्वरूप का साक्षात्कार कर लिया था। वे शरीर और आत्मा का अन्तर जानते थे तथा उनको इसकी अनुभूति थी।

एक बार महाराज जनक ने अष्टावक्र ऋषि को मुनियों की सभा में आमंत्रित किया। जैसे ही उन्होंने सभा में प्रवेश किया, वहां उपस्थित सभी व्यक्ति उन पर हंसने लगे। उन्हें सुनकर अष्टावक्र ऋषि भी हंसने लगे। सभी सभासद विस्मित होकर एक दूसरे से कहने लगे- ‘हम सभी उस पर हंस रहे हैं, परन्तु वह हमसे भी जोर से हंस रहा है, इसका क्या कारण है?’

महाराज जनक ने अपने सिंहासन से उठ कर अष्टावक्र ऋषि से पूछा, ‘आप क्यों इतनी जोर से हंस रहे हैं?’

मुनि ने उत्तर दिया, ‘मैंने सोचा था कि मैं ऋषि-मुनियों की सभा में जा रहा हूं। लेकिन आप सभी मेरी चमड़ी को ही देख रहे हैं। आपकी रुचि यह देखने में है कि कोई रूपवान है या कुरूप, स्वस्थ है या विकलांग, तरुण है या वृद्ध। आप सभी का मन इन नश्वर वस्तुओं में ही लगा हुआ है। आप सन्तों की तरह मेरी आत्मा का दर्शन नहीं कर पा रहे हैं। अन्तर में स्थित शाश्वत आत्मा की उपेक्षा करके बाहरी नश्वर शरीर को महत्व देना केवल अज्ञान है।’

अष्टावक्र ऋषि के शब्द महाराज जनक के हृदय को भेद गए। वे समझ गए कि मुनि एक आत्मतत्वविद् पुरुष हैं और राजसिंहासन पर बैठाने योग्य हैं। उन्होंने बड़े प्रेम से उन्हें सिंहासन पर बैठा कर प्रणाम किया और उन्हें अपने शिक्षा-गुरु के रूप में वरण किया।

शरीर हमारा स्वरूप नहीं है। भौतिक शरीर क्या है? यह हड्डियों, रक्त, मूत्र, एवं अन्य बहुत से अपवित्र पदार्थो का एक थैला मात्र है। मन भी भौतिक शरीर का ही एक अंग है और आत्मा से भिन्न है। यह अस्थायी सांसारिक भावों को ही वास्तविक मानता है, जिसके कारण यह छोटे-छोटे सुख और अत्यधिक वेदना का कारण बनता है। हम सभी ये शरीर या मन न हो कर अलग आत्मा हैं। यह शरीर नश्वर है। विश्व के समस्त डॉक्टर व विज्ञानी मिल कर भी वृद्धावस्था को रोक नहीं सकते। आज से बीस, तीस या पचास वर्ष बाद हम वृद्ध हो जाएंगे। लाठी के बिना चल नहीं सकेंगे। इसके कुछ समय बाद हमारी मृत्यु हो जाएगी। उस समय हमें वह सब कुछ त्यागना होगा, जो हमने जीवनकाल में संचित किया है।

इस संसार के अनन्त क्लेशों से हमारा कोई भी उद्धार नहीं कर सकता। एकमात्र भगवान ही हमारी सब प्रकार से रक्षा कर सकते हैं। यदि हम इसका अनुभव करें और उनकी प्रेममयी सेवा में लग जाएं, तो हम सुखी हो जाएंगे। चिन्मय आत्मा होने के कारण हम सभी उस एक ही परमेश्वर के अंश हैं। पेड़े-पौधों और पशुओं से लेकर मनुष्यों और देवताओं जैसी श्रेष्ठ योनियों में स्थित आत्माएं भी उनके अंश हैं। भारत के प्राचीन शास्त्र वेद कहते हैं, ‘ईश्वर एक है, यह संसार उनकी शक्ति या ऊर्जा का विस्तार मात्र है।’ ईश्वर में आस्था नहीं रखनेवाले भी प्राकृतिक जगत में विश्वास करते हैं। उनका मानना है कि सब कुछ प्रकृति से उत्पन्न होता है और फिर प्रकृति में ही लौट जाता है। यह प्राकृतिक जगत जिसमें वे श्रद्धा करते हैं, उस परमेश्वर की शक्ति का अंश मात्र है। हम परमेश्वर के विभिन्न अंश हैं, क्योंकि हमारी सृष्टि उनकी छवि के अनुरूप हुई है। लेकिन दुर्भाग्यवश हम उनसे विमुख हो गए हैं। यह भूल गए हैं कि हम कौन हैं? हम इस भौतिक शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मानते हैं। हम अपने समय को धन संचय और उच्च पदों के संग्रह में यह सोचकर व्यतीत करते हैं कि इनसे हमें सुख प्राप्त होगा। लेकिन यह धारणा पूरी तरह गलत है।

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  • Web Title:क्योंकि हम आत्मा हैं