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घटते उत्पादन के संकेत

यह डराने वाला आंकड़ा है। अक्तूबर महीने में औद्योगिक उत्पादन का शून्य से करीब पांच फीसदी नीचे पहुंच जाना हमारी अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा के बारे में बहुत कुछ कहता है। वैसे तो इसके संकेत पिछले महीने ही मिलने लग गए थे। इस साल सितंबर के औद्योगिक उत्पादन का आंकड़ा जब 1.9 फीसदी पर पहुंचने की खबर आई थी, तो यह साफ हो गया था कि बुरे दिन शुरू हो चुके हैं। हालांकि तब उम्मीद थी कि अक्तूबर में हालात सुधर सकते हैं। वैसे भी हमारी अर्थव्यवस्था में अक्तूबर उम्मीदों का महीना होता है। इस महीने में पूजा और दीपावली आदि त्योहार होते हैं और भारतीय मध्य वर्ग इन दिनों जमकर खरीदारी करता है। नौकरी पेशा वर्ग को बोनस मिलता है, इसलिए उसके पास भी खरीदारी के लिए अतिरिक्त धन होता है। खरीफ की फसल आ जाने से किसानों के पास भी पैसा आ जाता है, इसलिए वे भी बाजार पहुंच जाते हैं। पूरा उद्योग जगत इस महीने से बहुत उम्मीद रखता है, इसलिए उत्पादन बहुत ज्यादा बढ़ा दिया जाता है। पहले सितंबर महीने में उत्पादन का लुढ़कना और फिर अक्तूबर में गोता लगा जाना यह बताता है कि इस बार दीपावली के दीयों के पीछे वास्तव में कितना अंधेरा छिपा था। समस्या यह नहीं है कि औद्योगिक उत्पादन गिरा है, इसके खतरों की बात तो काफी लंबे समय से की जा रही थी। अगर पूरी दुनिया और खासकर विकसित देशों के बाजार मंदी की आंधी में धूल-धूसरित हो रहे हैं, तो उसके थपेड़े हमें भी हिलाएंगे, यह तो काफी समय से साफ था। दरअसल, समस्या यह है कि यह उत्पादन आशंका से कहीं ज्यादा तेजी से गिरा है और उससे भी ज्यादा बुरी बात यह है कि यह उस महीने में गिरा है, जब हम खुशहाली की आराधना करते हैं। जाहिर है कि इसके बाद हमें अपनी आर्थिक, वित्तीय और मौद्रिक नीतियों पर फिर से मंथन करना होगा। उन कारणों की भी पड़ताल करनी होगी, जिन्होंने हालात को यहां तक पहुंचाया।

इस बार दीपावली फीकी रहने का एक कारण महंगाई भी था। काफी समय से महंगाई से परेशान लोगों ने दीपावली जैसे मौके पर खुले हाथ खर्च करने से संकोच किया, तो इसमें कोई हैरत की बात नहीं है। इसी महंगाई पर नकेल कसने के लिए रिजर्व बैंक ने लगातार ब्याज दरों को बढ़ाया और इस नीति का असर भी आखिर में औद्योगिक उत्पादन पर पड़ा। दीपावली के मौके पर अक्सर लोग कर्ज और किस्तों पर सामान खरीदते हैं, लेकिन इस बार बहुत ज्यादा ब्याज दरों के कारण भी वे इससे दूर रहे। हालांकि औद्योगिक उत्पादन का अक्तूबर महीने में बहुत ज्यादा नीचे चले जाना सिर्फ इतना बताता है कि पिछले साल लोगों की दीपावली जितनी रोशन थी, उसके मुकाबले इस साल वह बहुत कम रही। ये आंकड़े दरअसल पिछले साल के आंकड़े की तुलना में पेश किए जाते हैं, उसमें कभी-कभी घटत-बढ़त बहुत ज्यादा दिखने लगती है। अगर यही उत्पादन अक्तूबर की बजाय किसी दूसरे महीने में हुआ होता, तो शायद यह आंकड़ा इतना खराब नहीं दिखता, शून्य से नीचे तो खैर नहीं ही जाता। फिर यह भी सच है कि यह आंकड़ा सिर्फ औद्योगिक उत्पादन का है। जबकि हमारी विकास दर में सेवा क्षेत्र और कृषि क्षेत्र के आंकड़े भी शामिल होते हैं। कृषि उत्पादन पिछले साल के मुकाबले ज्यादा हुआ है, जिसका असर हमें खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति के कम हो जाने में दिख भी रहा है। लेकिन औद्योगिक उत्पादन के इस कदर गोता लगाने में एक चेतावनी तो छिपी है ही। यह चेतावनी भी हमें उस समय मिल रही है, जब राजनीतिक आंदोलन के चक्कर में आर्थिक एजेंडा पीछे चला गया है।

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