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अब भी हिला देती है संसद पर हमले की वह घटना

वह 13 दिसंबर, 2001 के पौने बारह बजे के आसपास का वक्त था। संसद के दोनों सदन कारगिल युद्ध के दौरान हुए ताबूत खरीद घोटाले के चलते स्थगित हो गए थे। लिहाजा मैं संसद भवन से निकलकर ‘आज तक’ के दफ्तर लौट रहा था। दफ्तर के पास अभी पहुंचा ही था कि मेरे ड्राइवर की वॉकी-टॉकी और मेरे सेलफोन पर खबर आई कि संसद में फायरिंग की आवाजें सुनी गई हैं। बिना समय गंवाए मेरी गाड़ी संसद की तरफ भागने लगी। पार्लियामेंट एनेक्सी के सामने उस समय तालकटोरा रोड को आज की तरह बंद नहीं रखा जाता था। मेरी गाड़ी पार्लियामेंट एनेक्सी होती हुई विजय चौक की तरफ बढ़ने लगी।

गाड़ी से उतरकर मैं विजय चौक की तरफ भागा, तब एक साथ कई आवाजें मेरे कानों में गूंजीं। लेट जाइए, लेट जाइए, गोली लग सकती है। लेकिन अपने काम के धुन से मजबूर मैं आगे बढ़ता गया। किसी तरह मुझे ओवी वैन तक पहुंचना था। दो मिनट का वह समय दो घंटे-सा लगा था। उस वक्त तक न केवल गोलियों की तड़तड़ाहट बढ़ गई थी, बल्कि हथगोलों की आवाज भी सुनाई पड़ने लगी। तब तक गृह मंत्रालय से इसकी पुष्टि हो चुकी थी कि यह कोई ऐसा-वैसा हमला नहीं है, बल्कि यह दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र के मंदिर पर हुआ आतंकी हमला है। देश के जांबाज सिपाही उस आतंकवादी हमले को नाकाम करने में जुट गए थे।

शुक्र की बात यह रही कि जैसे ही गोलियां चलनी शुरू हुईं, संसद के सुरक्षा स्टाफ ने मेन बिल्डिंग को चारों तरफ से बंद कर दिया था, ताकि कोई आतंकी कम से कम संसद भवन के अंदर न घुस पाए। आतंकवादियों की तैयारी संसद भवन के अंदर घुसकर राजनेताओं को बंधक बनाने की थी। विजय चौक से मैं हमले की लाइव कमेंट्री को जैसे-जैसे आगे बढ़ा रहा था, वैसे-वैसे आस-पास का माहौल बदलता जा रहा था। सेना के जवान, बम निरोधक दस्ते, बड़ी-बड़ी मशीन गनों, ऑटोमेटिक हथियारों ने संसद को चारों तरफ से घेर लिया था। बहरहाल, गोलियों की आवाजें लगभग एक घंटे तक सुनाई पड़ती रहीं और उसके बाद छोटे-छोटे धमाके। फिर यह खबर आ गई कि तमाम आतंकवादियों को मार गिराया गया है।

उस घटना के दस साल बाद आज जब भी संसद के सामने से गुजरता हूं, तो 13 दिसंबर की तस्वीरें मानस पटल पर छा जाती हैं। इन 10 वर्षो में बहुत कुछ बदल गया है। संसद अब किसी अभेद्य किले की तरह है। उस हमले के बाद वहां की सुरक्षा का नक्शा पूरी तरह से बदल दिया गया है। अब बूम बैरियर लगे हैं। अब कोई गाड़ी उस अंदाज में संसद भवन में घुसने की सोच भी नहीं सकती। संसद भवन को तो हमने अभेद्य बना दिया है, लेकिन मन में हमेशा यह सवाल उठता रहता है कि पूरे देश की सुरक्षा संसद भवन की तरह अभेद्य कब बनेगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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