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कब्जा करने के कुछ भारतीय तरीके

इधर अमेरिका में वॉल स्ट्रीट पर कब्जे का आंदोलन चल रहा है। आंदोलनकारी कह रहे हैं कि हम 99 फीसदी हैं, पर हम गरीब हैं। एक फीसदी ने सब पर कब्जा कर रखा है- वॉल स्ट्रीट से लेकर राजनीति तक पर। खबर जब भारत पहुंची, तो कब्जा करने वाले असमंजस में पड़ गए। बोले, कब्जा तो ठीक है, पर वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करके मिलेगा क्या? उसमें पैसा कहां है?

खोसला का घोंसला टाइप के बिल्डर ने कहा- अरे यार, इतने प्लॉट खाली पड़े हैं। मजे से कब्जा करो, चाहे जितने पर करो। दो-चार लठैत रखने का ही तो खर्चा है, खुद मजे से चाहे कोठी में, चाहे फार्म हाऊस में रहो। फिर जिसको अपना प्लॉट वापस चाहिए, वह कीमत चुकाएगा।

मोती गोयल टाइप का कब्जा करने वाला बोला, भाई इतनी जमीन पड़ी है, चाहे जितनी कब्जा कर लो, पर इस तरह हल्ला-गुल्ला करके नहीं। चुपके से करो। दस एकड़-बीस एकड़-पचास एकड़ चाहे जितनी। सरकारी जमीन है। पंचायत की जमीन है। शामलात की जमीन है। जमीन की क्या कमी है। बस थोड़ा पटवारी-तहसीलदार वगैरह को पटाने की जरूरत होती है।

एक पार्टी के दबंग अपने लठैतों से बतियाते हुए अफसोस जता रहे थे- ये लोग क्या पूरी स्ट्रीट कब्जा रहे हैं? भई, सचमुच कमाल के लोग हैं। जरूर अमेरिकी राष्ट्रपति का हाथ इनकी पीठ पर होगा। हमें देखो दो-चार-दस कोठियां कब्जा कर संतुष्ट हो बैठे हैं। हमसे अच्छे तो दूसरी पार्टी  वाले दबंग हैं- कब्रिस्तान तक पर कब्जा कर गए। सरकारी जमीन पर कॉलोनी बसा गए।

कब्जा करने वाले पेशेवर पहलवानों में तो कब्जे की बात सुनकर इतना जोश आया कि वे मुगदर घुमाने लगे। उन्हें अफसोस हो रहा था कि उनकी पहलवानी कोई काम नहीं आ रही। वे शिकायत कर रहे थे कि इतने दिन से न किसी मकान-दुकान पर कब्जा किया और न ही किसी मकान-दुकान का कब्जा छुड़वाया। दूध-बादाम का खर्चा भी अब नहीं निकलेगा। उनकी इच्छा थी कि वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करने वाले उनसे संपर्क कर लें, तो अच्छी फीस मिल सकती है। डॉलर में। ऐसे और भी कितने ही नजरिये सामने आ रहे थे। क्योंकि न तो कब्जा करने वालों की कमी है और न ही कब्जा करने के तौर-तरीकों की।
सहीराम

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