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अलाद्दीन का चिराग नहीं जनलोकपाल बिल

 वाराणसी कार्यालय संवाददाता। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे का आन्दोलन तो सही है लेकिन लोकपाल बिल पारित हो जाने से क्या सभी तरह के भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जायेगी? क्या लोकपाल पारित हो जाने के बाद सारे घोटाले भुला दिये जायेंगे? जब एक बिल सभी प्रश्नों का जवाब देने के लिए सक्षम नहीं है तो फिर उसे भ्रष्टाचार के समूल अंत के लिए पर्याप्त कैसे मान लिया जाए। जब तक पूंजीपतियों के हाथ से सरकारें चलती रहेंगी तब तक आम आदमी की हालत और ज्यादा बद से बदतर होती जायेगी। ऐसे में जरूरत है दूसरी आजादी की। जो तब तक अधूरी रहेगी जब तक पूंजीपतियों के शोषण से देश की गरीब और मध्यम वर्गीय जनता को मुक्ति नहीं मिल जाती। यह उद्गार थे भाकपा माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्या के, जो रविवार को एंग्लो बंगाली प्राइमरी स्कूल में आयोजित भाकपा के ‘भ्रष्टाचार मिटाओ लोकतंत्र बचाओ’ विषयक सम्मेलन में बतौर मुख्य वक्ता उपस्थित थे। उन्होंने केन्द्र पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार ही जनता को शोषित बनाये रखना चाहती है तो फिर देश का कैसे भला होगा। ऐसे में जरूरत है कि जनता का विरोध जंगल में आग की तरह फैले, जिससे सरकार को घुटने टेकना पड़ जाए। सम्मेलन में पीयूसीएल के प्रदेश अध्यक्ष चितरंजन सिंह ने कहा कि आंदोलनों के पर दमन बढ़ा है, हमें इसके खिलाफ भी खड़ा होना चाहिए। भाकपा माले के पोलिक ब्यूरो मैम्बर रामजी राय, बीएचयू के प्रो. दीपक मलिक और भाकपा के राज्य सचिव सुधाकर यादव ने भी विचार व्यक्त किये।

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