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समझ से विरोध

लोकपाल पर राय कुछ भी हो, कुछ चीजें गौर करने लायक हैं। बड़े प्रदर्शन, सभाएं आदि रविवार या छुट्टियों के दिन हों, तो क्या आसानी नहीं होती? आम जनजीवन को कोई परेशानी नहीं। परेशानी हो भी, तो न्यूनतम। न रास्ता जाम, न जगह-जगह ट्रैफिक डाइवजर्न। खुद ही अनुशासन में रहकर पुलिस का काम आसान करना नए किस्म की राजनीतिक समझदारी है। अनुशासित विरोध को अधिक लोगों का समर्थन मिलता है।

विरोध किसी भी तरह अनियंत्रित हो, तो शामिल होने से ज्यादा लोग कतराने लगते हैं। अपनी मांगों को लेकर बहस की परंपरा भी अच्छी है। इससे किसी बात में वजन बढ़ता है। नेता अच्छे या खराब हो सकते हैं लेकिन लोकतंत्र में इनकी जरूरत तो है ही। फिर समय आने पर इन्हें बदलने का मौका भी हमारे-आपके पास है ही।

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