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लोकपाल- मानने और पलटने की पहेली

संसद की स्थायी समिति ने संसद में लोकपाल का नया ड्राफ्ट क्या रखा, टीम अन्ना जंतर-मंतर पर धरने पर जा बैठी। टीम अन्ना को याद आ रहा था संसद में पास हुआ ‘सेंस ऑफ द हाउस’ यानी संसद का वायदा। साथ ही अन्ना को लिखी प्रधानमंत्री की चिट्ठी। वह चिट्ठी, जो विलास राव देशमुख दूत बनकर लाए थे, जिसमें यह वायदा किया गया था कि सरकार लोकपाल बिल में अन्ना की तीन मांगों को शामिल करेगी। वे तीन मांगें थीं- एक, निचले स्तर की नौकरशाही को लोकपाल में शामिल करना। दूसरी, आम जनता को सरकारी दफ्तरों में काम करवाने के लिए जो धक्के खाने पाने पड़ते हैं, घूस देनी पड़ती है, उसके लिए सिटीजन चार्टर लागू करना। तीसरी, राज्यों में लोकपाल बिल के तहत लोकायुक्त की नियुक्ति। प्रधानमंत्री की इस चिट्ठी के बाद अन्ना ने आमरण अनशन खत्म कर दिया था। पर अब उम्मीद की जगह आशंका ने ले ली है।

स्थायी समिति का ड्राफ्ट आने के पहले से ही हाव -भाव ठीक नहीं लग रहे थे। हालांकि विमर्श के नाम पर टीम अन्ना से भी कमेटी ने राय-मशविरा किया। पर यह साफ होने लगा था कि दाल में काला है। खबरें छन-छन कर आने लगीं। खबर आई कि ‘सी’ और ‘डी’ श्रेणी के कर्मचारियों को बिल में रखा जाएगा। अगले ही दिन आपात बैठक बुला सी और डी को लोकपाल से बाहर कर दिया गया। यह क्यों हुआ? किसी के पास कोई जवाब नहीं। पहले क्यों रखा, बाद में क्यों निकाला, पता नहीं? फिर खबर आई कि सीबीआई को भी लोकपाल के दायरे से बाहर रखा जाएगा। सीबीआई लोकपाल द्वारा सौंपे गए मामले की जांच करेगी, लेकिन वह लोकपाल के अधीन नहीं होगी। लोकपाल भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए मामले को सीबीआई को भेजेगा और जांच के बाद सीबीआई वापस रिपोर्ट लोकपाल को भेज देगी। यानी सीबीआई पहले की ही तरह काम करती रहेगी और इस बात की कोई गारंटी नहीं होगी कि वह सरकार के प्रभाव में नहीं रहेगी। सीबीआई अगर सरकार के प्रभाव में है, तो फिर भ्रष्टाचार के मामलों की जांच कितनी निष्पक्षता से होगी, यह सब जानते हैं। यानी लोकपाल की आत्मा ही गायब।

फिर सिटीजन चार्टर को भी लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया। कहा गया कि इसके लिए एक अलग बिल बनेगा। हां, लोकायुक्त के लिए जरूर कहा गया कि लोकपाल बिल में एक यूनीफॉर्म कानून बनाया जाएगा। यानी तीन में से सिर्फ एक शर्त मानी गई। ऐसे में सवाल यह उठ सकता है कि संसद में ध्वनि मत से पारित हुए वायदे का क्या हुआ? क्या प्रधानमंत्री के दिए भरोसे का कोई मतलब नहीं है? अन्ना का कहना है कि उनके साथ धोखा हुआ है।

नाराज टीम अन्ना को भरोसे में लेने के लिए सरकार की तरफ से कभी कोई कदम नहीं उठाया गया। स्थायी समिति बैठकें करती रही और टीम अन्ना संसद पर दबाव बनाने के लिए सांकेतिक विरोध की तैयारी में जुटी रही। रैली और धरने जारी हैं। 27 दिसंबर से रामलीला मैदान में एक बार फिर बैठने का टीम का इरादा है। लड़ाई को और तेज किया जाएगा। संसद पहले से ही डिस्टर्ब है। कब चलती है और कब नहीं, यह पता ही नहीं चलता। बीजेपी पहले से ही आक्रामक है। पहले महंगाई और काला धन और बाद में खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश पर संसद का लगभग आधा सत्र स्वाहा हो चुका है।

कुछ ज्योतिषियों ने यह आशंका भी जता दी है कि सरकार गिरेगी या फिर मध्यावधि चुनाव होंगे, दोनों ही हालात में बीजेपी के हाथ में लड्डू होंगे। लिहाजा एक तरफ सड़क पर अन्ना और उनकी टीम है और दूसरी तरफ संसद में बीजेपी। समझदार के बारे में कहा जाता है कि वह एक साथ कई फ्रंट नहीं खोलता। पर यहां तीसरा फ्रंट भी खोल दिया गया है। तृणमूल कांग्रेस और डीएमके जैसे सहयोगी बिदके हुए हैं। ऐसे में सवाल कई हैं। क्या सरकार को अंदाजा नहीं है कि वह क्या कर रही है? क्या उसे यह अहसास नहीं है कि वह लोकपाल पर जितनी जिद करेगी, जनता में यह संदेश जाएगा कि वह भ्रष्टाचार से लड़ने के प्रति     गंभीर नहीं है?

पिछले दो वर्षों से भ्रष्टाचार से बुरी तरह त्रस्त मनमोहन सरकार के लिए यह सुनहरा मौका था। एक के बाद एक घोटालों के आरोपों ने मनमोहन सरकार की साख को भयंकर बट्टा लगाया है। पब्लिक के बीच सरकार की लोकप्रियता सबसे निचले पायदान पर है। लोकपाल के जरिये वह यह संदेश दे सकती थी कि वह भ्रष्टाचार से न केवल निपटने के लिए ईमानदार कोशिश कर रही है, बल्कि पूरी भ्रष्ट व्यवस्था को बदलना चाहती है। उत्तर प्रदेश के चुनावों के लिए यह कांग्रेस का ट्रंप कार्ड साबित हो सकता था, जो पार्टी और राहुल गांधी, दोनों के लिए फायदे का सौदा होता। अफसोस! ऐसा होता दिख नहीं रहा। जहां उन्हें लोकपाल का क्रेडिट लेना चाहिए, यह कहते हुए कि जो काम वर्ष 1963 से नहीं हुआ, उसे मनमोहन सरकार ने कर दिखाया। जो बिल आठ बार संसद में पेश होकर भी कानून नहीं बन पाया, उसे मनमोहन सिंह ने जनता की मांग पर पूरा कर दिया। यह मौका था, अपनी सरकार के खिलाफ जमा हुए गुस्से को समर्थन में बदलने का। पर सरकार विफल रही।

गुस्सा बढ़ता जा रहा है और सरकार निष्क्रिय है। मैं मान नहीं सकता कि इतने अनुभवी लोगों की मौजूदगी के बाद भी सरकार को अंदाज न हो कि लोग क्या चाहते हैं। मैं यह भी नहीं मान सकता कि यह काम इतना कठिन है कि मनमोहन सरकार क्या, कोई भी सरकार अपने समानांतर एक नई व्यवस्था खड़ा करने का जोखिम उठाएगी। मुझे लगता है कि लोकपाल तो महज बहाना है। इसकी आड़ में कोई और खेल खेला जा रहा है, जिसका पता देश को बाद में चले। लेकिन तब तक शायद इतनी देर हो जाए कि कुछ भी कहने-सुनने को न रह जाए।
( ये लेखक के अपने विचार हैं)

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