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उनकी शादी, अपनी बरबादी

जाने कैसे लोग कहते हैं कि शादियां ऊपर तय होती हैं। हमने तो देखा है कि जन्म-पत्रियों से लेकर दहेज तक की सौदेबाजी को यहीं धरती पर घटते हुए। किसी ने प्रेम-विवाह कर लिया, तो गनीमत, वरना कम जटिल नहीं है दूल्हा खोजने-खरीदने की समस्या। ‘चट मंगनी पट ब्याह’ कहने की बातें हैं। लड़कियों की शिक्षा-नौकरी और आदमी-औरत की बराबरी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा यह कम्बख्त नौशे का मूल्य ही है, जो दहेज कहलाता है। पढ़ी-लिखी, नौकरी-पेशा कन्याओं को इस क्रय-विक्रय में कोई रियायत नहीं है। वहीं लड़का घी का लड्डू है। नालायक हो, तब भी कुछ कीमत तो लगनी ही लगनी है।

इन सब कठिनाइयों के बावजूद लगन का मुहूर्त आया नहीं कि बैंड से लेकर पंडित, विवाह-स्थल, हलवाई, सभी इतने व्यस्त हो जाते हैं कि दिन में तीन-तीन शादियां निपटाने की नौबत आ जाती है। कई बार तो ऐसा होता है कि एक ही स्थान पर तीन-चार मंडप हैं और तीन-चार शादियां। हम इस भ्रम के भुक्तभोगी हैं। एक का स्नेह भेंट का लिफाफा हम दूसरे की शादी में दे आए थे। पत्नी हमें आज तक ‘पढ़ा-लिखा गंवार’ कहकर कोसती हैं। अपने एक पेटू मित्र हैं। वह बंद गले या सूट-टाई में सजे-धजे, ब्याह-बाढ़ का पूरा आनंद लेते हैं। वह हर वैवाहिक भोज के बिन बुलाए मेहमान हैं। ऐसे कई होंगे।

आमंत्रित अतिथियों की दिक्कत है। आर्थिक संकट सिर्फ कन्या-पक्ष तक सीमित नहीं है। आमंत्रण लड़की की शादी का हो या लड़के की, जेब पर बीतना ही बीतना। ‘शोभा बढ़ाने’ अथवा ‘आशीर्वाद’ देने जैसी हरकतें जाने क्यों खाली हाथ संपन्न नहीं होती हैं। यह कौन-सा तरीका है? आशीर्वाद भी दो और पैसा भी। तिस पर इस रकम में लगातार इजाफा है। कभी यह राशि 51 की होती थी, अब तरक्की कर पांच सौ-हजार तक आ पहुंची है। वेतन की सीमा है, लिफाफे की कोई सीमा क्यों नहीं है? कुछ पैसा-हींचू निमंत्रण में शरारतन नोट लगाते हैं- ‘कृपया, भेंट-गिफ्ट न लाएं।’ स्पष्ट आशय है कि जब कुछ लाएं, तभी आएं! एक ही इल्तिजा है। अपनी तो हो ली, अब दूसरों की शादियां रुक जाएं। इस राष्ट्रीय संकट पर कोई वैधानिक रोक लगा दे, यदि यह नामुमकिन है, तो लिफाफों पर ही रोक लगा दी जाए।
गोपाल चतुर्वेदी

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  • Web Title:उनकी शादी, अपनी बरबादी