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भय से भयभीत

क्या आप भय की कल्पना ही से भयभीत हो जाते हैं? ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है, जो खुलेआम, बेझिझक अपने भय को कबूल करे। खुद के सामने भी यह मानने में तकलीफ होती है कि हमें डर लगता है। मनुष्य के भावों के पिटारे में जितने भी भाव हैं, उनमें भय एक ऐसा है, जो सभी पशु-पक्षियों में भी होता है। आत्मरक्षा के लिए प्रकृति का दिया हुआ यह एक रक्षा-कवच है।

जिसमें भय नहीं होगा, तो यह वैसे ही होगा, जैसे विटामिन की कमी हो। तब कोई सड़क पर भोंपू बजा रहा होगा और यह इसकी परवाह न करते हुए, सड़क पर चलता ही रहेगा। सांप रास्ते में होगा और वह अपनी रक्षा नहीं करेगा, वह चलता ही रहेगा।

भय हमारी बुद्धि का अंश होता है, इसमें कुछ भी बुरा नहीं। भय हमें यही याद दिलाता है कि मौत भी होती है और हम मनुष्य यहां पर थोड़े ही समय के लिए हैं। एक बार ओशो से किसी ने पूछा, जब भय हो, तो क्या किया जाए? ओशो ने कहा, ‘तुम कुछ करने की बात क्यों पूछते हो? जब भय है, तो भयभीत हो।
दुविधा की स्थिति क्यों लाते हो? जब भय के क्षण आते हैं, भय से कांपो, भय को हावी होने दो। तुम जीवन को किसी तरह अपने ऊपर आधिपत्य क्यों नहीं करने देते?’

जब भय आता है, तो शरीर में कंपन शुरू होता है। खासकर पेट में नाभि के पास ऐंठन होती है, छुप जाने को जी करता है। बेहतर यही होगा कि तेज हवा के झोंके में जिस तरह पत्ते कांपते हैं, वैसे कांपो। आपने भय को कभी इतना आदर, इतना अवसर दिया ही नहीं कि भय खुद को खुलकर प्रकट करे। एक बार भय खुलकर प्रकट हो और फिर चला जाए, तो आप बहुत स्वच्छ और शांत अनुभव करेंगे, जैसे भारी तूफान के बाद हर चीज निर्मल हो जाती है।
अमृत साधना

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