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जब कोई कैंसर से हारता है...

कल रात संध्याजी के जाने की खबर पाने के बाद से बहुत व्यथित हूं। लगातार उनके बारे में सोच रही हूं। मेरे डिस्टर्ब होने का बड़ा कारण है कि वह मेरी ‘कैंसर बड्डी’ हैं। नहीं, उनसे इस विषय पर कभी कोई बात नहीं हुई, लेकिन जब भी कोई कैंसर से हारता है, तो मुझे लगता है कि इसमें मेरी भी थोड़ी हार है और यह तथ्य मुझे परेशान कर जाता है। क्यों मैं कुछ नहीं कर पाई? क्या मेरे बात करने भर से सूत भर भी अंतर आ पाता? संभावना हमेशा रहती है, तो मैंने उस मोर्चे पर कसर छोड़ ही दी!

आप सोचेंगे, यह कहां की महारथी हैं! बड़े-बड़े डॉक्टर जहां हार गए, वहां इस चींटी की क्या औकात कि कुछ बदलाव लाने के बारे में सोचे? लेकिन मुझे लगता है कि ज्यादातर कैंसर मरीज एक संबल ढूंढ़ते हैं, अपनी उत्तरजीविता की उम्मीद बनाए रखने के लिए। और कोई कैंसर विजेता उन्हें दिलासा दे पाए, तो यह उनमें बड़ी राहत भर देता है। यह मानसिक आश्वासन बहुत काम का होता है, शरीर के लिए और परेशान-थके मन के लिए भी। मेरा अपना अनुभव कहता है।

इसके अलावा, ज्यादातर हिन्दुस्तानी एक समय के बाद अस्पताली सहयोग लेने में संकोच करने लगते हैं और फिर वैद्य-हकीम से उम्मीद करते हैं कि वे कुछ कर पाएंगे। निराश होने के समय में भी एलोपैथी में ज्यादा संभावनाएं हैं। कैंसर खतरनाक बीमारी जरूर है, पर अगर हम सतर्क रहें, अपने शरीर को और इस बीमारी को जानें-पहचानें और जल्द और पूरा इलाज कैंसर अस्पताल में करवाएं, तो जिंदगी लंबी हो सकती है।
चोखेर बाली में आर अनुराधा

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