DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मजबूत लोकपाल की राह

यह कोई सामान्य विधेयक नहीं है कि संसद में पेश हुआ, स्थायी समिति ने कुछ संशोधन नत्थी किए, फिर दोनों सदनों में बिल पास हो गया और अगली सुबह तक लोग इसे भूल भी गए। लोकपाल विधेयक एक ऐसा मुद्दा है, जो पिछले कुछ समय से तकरीबन पूरे देश को मथ रहा है। सभी राजनीतिक दलों के मत और भेद अपने-अपने ढंग से इससे जूझ रहे हैं। सरकार का मूल विधेयक, टीम अन्ना का जन लोकपाल विधेयक, संसद की स्थायी समिति के ढेर सारे संशोधनों के साथ पेश हुआ विधेयक, ये सारे मसौदे अपने-अपने हिस्से की बहस और आलोचनाओं से गुजर रहे हैं।

संसद के भीतर यह मुद्दा एक अलग तरीके से उठ रहा है और सड़कों पर दूसरे ढंग से। संसद के भीतर इसे लेकर सांसदों का नजरिया बहुत हद तक पार्टी स्टैंड के हिसाब से बनता-बिगड़ता दिख रहा है। संसद के बाहर सड़कों पर टीम अन्ना की सक्रियता है, जो अपने तर्कों को भ्रष्टाचार के खिलाफ उमड़ी जनता की भावुक भावनाओं से जोड़ रही है। रविवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो हुआ, वह इस मायने में महत्वपूर्ण है कि वह संसद के समीकरणों और सड़क के आंदोलन के बीच पुल बांधने की एक कोशिश थी। टीम अन्ना ने यहां सभी राजनीतिक दलों को आमंत्रित किया था और लगभग सभी विपक्षी दल वहां आए भी।

यह ठीक है कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की गैरमौजूदगी से मंच सर्वदलीय नहीं बन सका, लेकिन इसकी वजह समझी जा सकती है। वहां जो भीड़ जुटी थी, उसके नेता सरकार और उसमें शामिल राजनीतिक दलों को खलनायक की भूमिका में पेश करते रहे हैं। लोकपाल का मुद्दा इस समय जिस स्थिति में है, सरकार और उसमें शामिल दल किसी भी अप्रिय स्थिति से बचना चाहेंगे। एनसीपीआरआई के निखिल डे जब जंतर-मंतर पर भाषण दे रहे थे, तो उस समय हुआ शोर यह बताता है कि भीड़ बहुत ज्यादा विरोधी विचारों को सुनने के मूड में थी भी नहीं।

जंतर-मंतर पर टीम अन्ना और विपक्षी दलों, दोनों को अपने-अपने तरीके से सच का सामना करने का मौका मिला। जहां विपक्षी दलों को यह समझ में आया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जो लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, उनका जज्बा कैसा है और वे चाहते क्या हैं। दूसरी तरफ, टीम अन्ना को भी यह पता चल गया कि मजबूत लोकपाल तो सभी चाहते हैं, लेकिन आखिर में जिस संसद में यह बिल पास होना है, वहां उनकी सभी बातों को समर्थन मिल जाए, यह जरूरी नहीं है।

मंच पर भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में मौजूद अरुण जेटली ने बिल को पूरा समर्थन देने की बात जरूर कही, लेकिन अभी यह साफ नहीं है कि बिल के अलग-अलग प्रावधानों पर संसद में पार्टी का रुख क्या होगा। वामपंथी पार्टियों के प्रतिनिधियों ने अपनी असहमतियां खुलकर रखीं। वे नहीं चाहते कि न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में रखा जाए, उनका मानना है कि इसके लिए न्यायिक जवाबदेही विधेयक पारित होना चाहिए।

भाकपा के डी राजा ने लोकपाल के भीतर महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की बात करके सबको भारतीय समाज की एक दूसरी हकीकत से रूबरू कराया। जेडी-यू के शरद यादव ने तो एक तरह से यह तक कह दिया कि यह उपयुक्त मंच नहीं है और वह अपनी बात संसद में ही रखेंगे। जंतर-मंतर के मंच पर जो बातें उभरकर आईं, वे यही बताती हैं कि मजबूत लोकपाल एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर कोई एक राय बनाना आसान नहीं है, और अगर आम राय से काम करना है, तो सभी पक्षों को अपनी कोई न  कोई जिद छोड़नी होगी। सरकार को भी।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:मजबूत लोकपाल की राह