DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

पर्यावरण और अमेरिका

रोम जब जल रहा था, तो नीरो बंसी बजा रहा था। शायद ऐसा नहीं हुआ होगा। आज जिसे हम बंसी कहते हैं, वह तो तब थी ही नहीं। इसकी भी गुंजाइश है कि उस वक्त के इतिहासकारों ने कोई मनगढ़ंत कहानी बना दी हो। यकीन नहीं होता कि अत्याचारी, निर्दयी व हत्यारा नीरो अपने साम्राज्य को जलते देखने की मूर्खता कर सकता था। वह भी बिना कुछ किए धरे ही। पर हम तो नीरो से भी गए गुजरे हैं।

जलवायु परिवर्तन अब सैद्धांतिक अवधारणा मात्र नहीं है, जिस पर विज्ञान के पढ़ाकू बौद्धिक विलास करें। इसके कुप्रभाव दिख रहे हैं। पिछले 15 वर्षों में 13 सबसे गरम साल दर्ज किए गए हैं। अमेरिका में सिर्फ इसी साल 12 मौसम संबंधी आपदाएं आईं। 2010 में 5.9 फीसदी की खतरनाक दर से कार्बन उत्सजिर्त हुए। वर्ष 2003 के बाद की यह सबसे बड़ी छलांग रही और हम अमेरिकी क्या कर रहे हैं? बस बंसी ही तो बजा रहे हैं!

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की 17वीं सालाना बैठक शुक्रवार को डरबन में खत्म हो गई। लक्ष्य था क्योटो प्रोटोकॉल का वारिस ढूढ़ना या किसी नई संधि  को लाना। हम माफी की उम्मीद कर सकते हैं, क्योंकि हम इससे अनभिज्ञ रहे। अमेरिकी मीडिया ने इसे नजरंदाज किया। वर्ष 2009 में सदन में डेमोक्रेटों का बोलबाला था। तब जलवायु संबंधी कोई भी विधेयक आसानी से पारित हो सकता था। कोपेनहेगन सम्मेलन में कांग्रेस के 20 से अधिक सदस्य शामिल हुए। पर इस साल कोई नहीं दिखा।

मुख्य जलवायु वार्ताकार टोड स्टर्न ने कहा कि उन्होंने कानूनी बाध्यता वाली संधि की वकालत की है, पर चीन व भारत जैसे विकासशील देशों पर भी वही मापदंड लागू हो, जो हम पर होंगे। उन्हें मालूम था कि ये देश इस तरह के समझौते में नहीं बंधेंगे। मामला वहीं है। बहरहाल, अंदेशा है कि इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में चार डिग्री की बढ़ोतरी होगी। इसके मतलब होगा- समुद्र के जल-स्तर का विध्वंसकारी सीमा तक पहुंचना, अकाल, भुखमरी और मौसम संबंधी विनाश होना। उस वक्त तक हम सब मर चुके होंगे, पर हमारी अगली पीढ़ी इसके लिए हमें माफ नहीं करेगी।
द लॉस एंजेलिस टाइम्स, अमेरिका

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:पर्यावरण और अमेरिका