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ड्रैगन सिर्फ अपनी सोचता है

‘आप भारत के बारे में क्या सोचते हैं’- मैंने बीजिंग की उस सर्द शाम एक चीनी राजनयिक से पूछा। जवाब चौंकाने वाला था- ‘भारत के लोग बहुत चालाक हैं और वे गणित में बहुत अच्छे होते हैं।’ उत्तर संक्षिप्त और बहुअर्थी था। ‘चालाक’ और ‘गणित में तेज।’ दोनों को अलग-अलग और फिर मिलाकर आंकिए, किसी कंप्यूटर फाइल की तरह तमाम अर्थ खुलते नजर आएंगे।

मेरा अगला सवाल था- ‘चीन तो बहुत आगे निकल गया है, पर आप कौन-से ऐसे क्षेत्र पाते हैं, जहां भारत अगुवा साबित होता है?’ इस बार भी उत्तर नपा-तुला और सारगर्भित था- ‘अफ्रीका। वहां आप लोगों ने बहुत पहले से काम शुरू कर दिया है। हमें उसकी बराबरी करने में बहुत समय लगेगा।’ मैंने कुछ क्षणों में जो जोड़ा-घटाया, उसकी ध्वनियां साफ थीं। चीन भारत को अपना प्रतिस्पद्र्धी मानता है। ड्रैगन दुनिया में अपनी ताकत और बढ़ाना चाहता है, इसमें वह अफ्रीका महाद्वीप में भारत को अपने से आगे पाता है, जो उसे स्वीकार्य नहीं है। आम चीनी नागरिकों के बीच हिन्दुस्तानियों की छवि चालाक, धूर्त और कई समीकरणों को एक साथ साधने में माहिर लोगों की बना दी गई है।

गौर कीजिए। ऐसी ही छवि भारत में चीनी नागरिकों के लिए है। हम मानते हैं कि इस महादेश ने ‘चीनी-हिंदी भाई-भाई’ के नेह भरे रिश्ते की पीठ में खंजर घोंपा था। आज भी भारत की लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर लाल सेना ने कब्जा जमा रखा है और अक्सर उसके सैनिक हमारी सीमा का अतिक्रमण करते रहते हैं। मुलाकात बहुत छोटी थी, इसलिए ज्यादा नहीं पूछ पाया, लेकिन मन में सवाल उठा कि पिछले लगभग पांच दशकों में दोनों देशों की जनता के बीच अविश्वास के गहरे बीज बो दिए गए हैं, उन्हें दूर किए बिना भला हमारे रिश्ते सामान्य कैसे हो सकते हैं?

उदाहरण के तौर पर पाकिस्तान को ले लीजिए। इस देश से भारत तीन बार जंग लड़ चुका है (मैं यहां जान-बूझकर कारगिल को नहीं गिन रहा), फिर भी सीमाओं के दोनों ओर लोगों के दिलों की धड़कनें मिलती हैं। इसकी वजह यही है कि तमाम खून-खराबे के बावजूद हमारा रोटी और बेटी का रिश्ता बना हुआ है। उभरती हुई टेनिस स्टार सानिया मिर्जा अगर एक पाकिस्तानी क्रिकेटर से शादी कर लेती हैं, तो दोनों तरफ जश्न मनाया जाता है। चीन के साथ ऐसा नहीं है। दुरूह सीमाओं ने दोनों देशों के अवाम को दूर रखा है।

दलाई लामा की मानें, तो भारत और चीन की तो सीमा ही नहीं मिलती। बीच में तिब्बत पड़ता है, जिस पर बीजिंग की फौजों ने कब्जा जमा रखा है। दलाई लामा कहते हैं कि तिब्बत की आजादी जरूरी है। भारतीय भूमि की रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि भारत और चीन के बीच में यह ‘बफर स्टेट’ बना रहे। वह सही हो सकते हैं, पर उनका संघर्ष क्या बुढ़ा नहीं चला है? इस आध्यात्मिक गुरु और शासक को जूझते-जूझते 52 साल हो गए।

चीनियों की तरह भारत में भी कुछ लोगों का मानना है, दलाई लामा और उनके अनुयायी दोनों देशों के बीच गर्मजोशी कायम करने में एक बाधा हैं। इस बार भी चीन ने उनकी आड़ ली है। नई दिल्ली में एक बौद्ध सम्मेलन क्या आयोजित हुआ कि बीजिंग ने नजरें ही टेढ़ी कर लीं। आनन-फानन में वहां के खुदमुख्तारों ने द्विपक्षीय बातचीत रद्द कर दी। उन्हें ऐतराज था कि दलाई लामा के साथ इस सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी शिरकत करने वाले हैं। इस ऐतराज के बाद प्रतिभा देवी सिंह पाटिल और डॉ. मनमोहन सिंह समारोह में नहीं गए। सवाल उठता है कि हम कब तक बीजिंग की इस शतरंजी चाल में फंसते रहेंगे?

पिछले साल जब दलाई लामा को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलना था, तब भी चीन ने कई गीदड़ भभकियां दी थीं, पर ओबामा अडिग रहे। संसार का सबसे ताकतवर लोकतंत्र अगर इस तरह सोचता है, तो सबसे बड़ी जम्हूरियत को भी अपनी शक्ति का एहसास होना चाहिए। अब हिन्दुस्तान उन देशों की श्रेणी में नहीं आता, जिन्हें ऐरा-गैरा, नत्थू-खैरा मानकर ताकतवर देश आगे बढ़ जाया करते थे। शायद यही वजह है कि कुछ खींचातानी के बाद चीन के वार्ताकार दिल्ली आए और फैसला हुआ कि गुत्थियां सुलझाने के लिए हम पहले की तरह मिलते रहेंगे। बीजिंग शायद इसलिए भी दबाव महसूस कर रहा है कि भारत अमेरिका और जापान के साथ एक बातचीत में हिस्सा लेने जा रहा है, जिसका मकसद ड्रैगन की फुंफकारों पर काबू पाना है।

बीजिंग में मिले उस चीनी राजनयिक की बातों की ही तरह ड्रैगन की कलाबाजियां बड़ी रहस्यमय हैं। वहां के कूटनीतिज्ञ कार्बन उत्सजर्न, पर्यावरण नियमों और बाजार की व्यवस्थाओं को लेकर अक्सर भारत के साथ चलने की बात करते हैं। ये वे मुद्दे हैं, जिनमें चीन का भला है। पर जब भी दोनों देशों की द्विपक्षीय बात आती है, चीनियों के सुर बदल जाते हैं। हम बड़े अफसोस के साथ याद कर सकते हैं। अरुणाचल को तो यह देश अपना हिस्सा बताता ही रहा है, पर पिछले दिनों कश्मीर के लोगों के लिए वीजा संबंधी नए नियम बनाकर चीनियों ने साबित कर दिया था कि वे भारत को अस्थिर करना चाहते हैं। पूर्वोत्तर के अलगाववादी गुटों से उनकी सहानुभूति पहले से रही है। अब वे भारत को दोतरफा लड़ाई की आग में झोकने की कोशिश कर रहे हैं।

यही नहीं, दक्षिण चीन सागर में जब भारत ने वियतनाम के साथ मिलकर तेल खोदने की जुगत शुरू की, तो चीनी नौसेना ने हमारे पोत को धमकी दी। हमेशा की तरह बाद में कूटनतिज्ञों ने इसे ‘बेबुनियाद’ करार दिया, पर यह सच है कि चीन नहीं चाहता कि उसके पड़ोसियों से भारत कोई भी रिश्ता बनाए। इसके विपरीत आतंकवादियों के आगे बेबस पाकिस्तान की सरकार को समर्थन देकर उसने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि उसकी रुचि हर उस चीज में है, जो नई दिल्ली को परेशान कर सकती है। यही नहीं, नेपाल, म्यांमार, मालदीव, बांग्लादेश और श्रीलंका में चीन अपनी पकड़ बढ़ाता जा रहा है। मतलब साफ है, उसे हिंद महासागर में अपनी दखल बढ़ानी है, जो हर लिहाज से हमारे सामरिक हितों के प्रतिकूल है।

सवाल उठता है कि ऐसे में भारत क्या करे? चीन की पैदा की हुई समस्याओं के कई समाधान हो सकते हैं। नरसिंह राव ने ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ बनाई थी। इसके तहत हमें म्यांमार से लेकर वियतनाम और दक्षिण कोरिया से अपनी साझेदारी मजबूत करनी थी। राव के बाद यह काम कुछ ढीला पड़ गया। मौजूदा सरकार ने इसे थोड़ा-सा बढ़ाया है। इसे और गति देने की जरूरत है। इसी के साथ ऑस्ट्रेलिया के साथ भी हमें अपनी नई पहचान कायम करनी है। ऑस्ट्रेलिया और चीन पिछले दशकों में एक-दूसरे के प्रबल व्यावसायिक पार्टनर बन गए हैं।

इधर अमेरिका ने ऑस्ट्रेलियाइयों के साथ मिलकर ‘हिंद-प्रशांत’ रीति-नीति को गढ़ना शुरू किया है। भारत को भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए। इससे चीन को लगेगा कि भारत उसकी उम्मीदों से कहीं अधिक बलवान है और वह बातचीत की टेबल पर अपने तेवर नर्म करने को मजबूर हो जाएगा।

कुछ और भी संकेत हैं, जो अपशकुनों की ओर इशारा करते हैं। पेंटागन में वितरित एक रिपोर्ट बताती है कि चीन के पास तीन हजार परमाणु हथियार हैं, जबकि भारत के पास कुल सौ। यह असंतुलन घातक है। उम्मीद है, कूटनीतिक स्तर पर हमारे सत्तानायक इन शतरंजी चालों का जवाब दे रहे होंगे। पश्चिम से कुछ आशाजनक संकेत मिले हैं, पर अभी बहुत काम किया जाना शेष है।

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