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उम्मीद है लोकपाल विधेयक इसी सत्र में पास हो जाएगा

भ्रष्टाचार के खिलाफ समाजसेवी अन्ना हजारे द्वारा साल के शुरू में छेड़ी गई मुहिम वर्ष के अंत में रंग ला रही है। सरकार द्वारा अगस्त में संसद में पेश लोकपाल विधेयक को कार्मिक, लोक शिकायत, विधि व न्याय संबंधी संसदीय समितियों ने नए संशोधन सुझाते हुए नया रूप दिया है। अब जो विधेयक तैयार हुआ है, उसके बारे में दावा है कि वह ज्यादा समग्र है। समिति की रिपोर्ट व लोकपाल के स्वरूप को लेकर अभिषेक मनु सिंघवी से बात की हिन्दुस्तान के ब्यूरो चीफ मदन जैड़ा और विशेष संवाददाता सुहेल हामिद ने। बातचीत के मुख्य अंश:


लोकपाल का प्रस्ताव पहली बार आपके पिता दिवंगत एलएम सिंघवी ने पेश किया था। तकरीबन 50 साल बाद आपने एक मजबूत लोकपाल विधेयक संसद को सौंपा है, कैसा लगा?

इतिहास का हिस्सा बनना यकीनन एक अच्छा अनुभव है। विधि के विधान और काल के चक्र से ही यह संभव हुआ। मेरे पिता ने पहली बार ओंबड्समैन के लिए लोकपाल शब्द दिया था। संसदीय इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण होंगे, जब पिता के दिए शब्द को हकीकत में बदलने की प्रक्रिया से बेटा जुड़ा होगा। यह मेरे लिए बेहद गर्व की बात है। मैं बहुत खुश हूं।

लेकिन टीम अन्ना ने रिपोर्ट को कमजोर बताते हुए खारिज कर दिया है?
जब अन्ना हजारे ने अनशन तोड़ा था, तो उनकी तीन प्रमुख मांगों पर संसद में एक प्रस्ताव पारित किया गया था। इन तीन मागों में एक थी सिटीजन चार्टर बने, हमने रिपोर्ट में इसकी सिफारिश की है। सरकार इस दिशा में पहले ही कदम उठा चुकी है और विधेयक तैयार है। दूसरी मांग थी लोकपाल कानून के जरिये ही लोकायुक्तों की नियुक्ति हो, समिति ने इसकी भी सिफारिश की है। तीसरी मांग थी कि सभी कार्मिकों को लोकपाल के दायरे में लाया जाए। यह भी हो गया है। हमारी सिफारिश के अनुसार ग्रुप ए और बी के कर्मचारी लोकपाल के दायरे में आएंगे। जबकि राज्यों की निचली ब्यूरोक्रेसी भी लोकायुक्तों के दायरे में आएगी। बाकी केंद्र सरकार के ग्रुप सी और डी कार्मिक मुख्य सर्तकता आयुक्त यानी सीवीसी के अधीन आएंगे। सीवीसी लोकपाल को रिपोर्ट करेगा। इस प्रकार परोक्ष रूप से सभी कार्मिक लोकपाल के दायरे में आ रहे हैं।

लेकिन प्रधानमंत्री, न्यायपालिका, सीबीआई और सीवीसी को लोकपाल के अधीन लाने पर कुछ नहीं किया गया है?
ऐसा नहीं है कि कुछ नहीं किया। पीएम को दायरे में लाने के मुद्दे पर हमने तीन विकल्प सुझाए हैं और फैसला संसद पर छोड़ा है। न्यायपालिका के लिए अलग से विधेयक तैयार हो चुका है। रही बात सीवीसी और सीबीआई की, तो उन्हें लोकपाल के दायरे में नहीं रखने के बावजूद उनके और लोकपाल के कामकाज में संतुलन बनाने के लिए उन्हें लोकपाल से संबंधित रखने की सिफारिश की है।

प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने पर आपकी निजी राय क्या है?
निजी तौर पर मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए।

सीबीआई पर कुछ नहीं किया? उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठते रहते हैं?
समिति सीबीआई के कामकाज को लेकर नहीं बैठी थी। इसलिए हमने अपना कार्यक्षेत्र सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधी शाखा तक ही रखा।

क्या इस लोकपाल से भ्रष्टाचार कम होगा और बदनामी के दाग धुलेंगे?
निश्चित रूप से। लेकिन इसमें समय लगेगा, क्योंकि भ्रष्टाचार समाज में अपनी जड़ें मजबूती से जमा चुका है। एक तरह से वह हमारी संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। मजबूत कानून के बावजूद इसे उखाड़ने में वक्त लगेगा। लेकिन हमें सकारात्मक सोच रखनी चाहिए।

क्या इसी सत्र में इस विधेयक को पारित करा पाएंगे ?
समिति में शामिल 14 राजनीतिक दलों के सदस्यों ने 24 पेचीदे मुद्दों पर ढाई महीने में 15 बैठकें करके करीब 40 घंटे के विचार-विमर्श के बाद रिपोर्ट तैयार की है, ताकि इसी सत्र में उसे पारित किया जा सके। सरकार और सभी राजनीतिक दल इस मुद्दे की गंभीरता और महत्व को समझते हैं। इसलिए उम्मीद है कि इसी सत्र में यह विधेयक पारित हो जाएगा।

समिति के 30 में से 16 सदस्यों ने सिफारिशों से असहमति जताई है। ऐसे में कैसे माना जाए कि रिपोर्ट सबकी सहमति से बनी है?
सभी मुद्दों पर सहमति कभी नहीं बन पाती। फिर भी 24 में से 13 मुद्दों  पर सभी सहमत थे। कुछ मुद्दों पर सदस्य सहमत नहीं थे, इसलिए उन्होंने असहमति नोट दिए। इसमें कांग्रेस के सदस्य भी हैं। समिति की बैठक पार्टी लाइन पर नहीं होती है, इसलिए कांग्रेस सदस्यों का किसी मुद्दे पर असहमत होना अनोखी बात नहीं है।

लोकपाल के साथ कितने और कानूनों में संशोधन करना होगा?
करीब चार पुराने कानूनों में संशोधन करना होगा, जिसमें भ्रष्टाचार निरोधी कानून, दिल्ली स्पेशल पुलिस ऐक्ट, सीवीसी ऐक्ट, सीआरपीसी ऐक्ट शामिल हैं। इसके अलावा संविधान संशोधन विधेयक लाना होगा। इस दिशा में संबंधित महकमों द्वारा पहले से ही तैयारी की जा रही है। 

रिपोर्ट आपने तैयार की, लेकिन अन्ना हजारे को कितना श्रेय देंगे ?
भ्रष्टाचार का मुद्दा मानव सभ्यता जितना ही प्राचीन है। विकास और तकनीक ने भ्रष्टाचार को और भी व्यापक बना दिया। अब यह समाज की रग-रग में एक संक्रामक रोग की तरफ फैल गया है। अन्ना हजारे अपने आंदोलन के जरिये इस मुद्दे को बाहर निकालने में सफल रहे हैं। इसलिए मैं उनका भी शुक्रगुजार हूं।

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