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सिखाती तो नाकामी ही है

इन्फोसिस के जनक एनआर नारायण मूर्ति अब रिटायर हो गए हैं, लेकिन शैक्षणिक और सामाजिक गतिविधियों के कारण वह लगातार चर्चा में हैं। उन्होंने तीस साल पहले साल 1981 में दस हजार रुपये की पूंजी से इन्फोसिस शुरू की थी, जिसका टर्नओवर आज तीस हजार करोड़ रुपये से भी अधिक है। किंवदंती बन चुके नारायण मूर्ति हमेशा ही कुछ नया करने, अपने जीवन में मूल्यों को महत्व देने, गांधीवाद को अपनाने और सही वक्त पर पद छोड़ने के पैरोकार रहे हैं। उन्हें शीर्ष शिक्षा संस्थान विद्यार्थियों को मार्गदर्शन देने के लिए बुलाते हैं, जहां वह अपने अनुभवों को बांटते हैं।

न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में दिया गया उनका एक भाषण काफी महत्वपूर्ण है, जिसमें उन्होंने युवाओं से कहा था- अपने काम से प्रेम करो, कंपनी से नहीं, क्योंकि आप नहीं जानते कि कंपनी कब आपसे प्रेम करना बंद कर देगी। 

आराम भी जरूरी है, काम की तरह
‘मैं ऐसे लोगों को जानता हूं, जो सप्ताह में छह दिन रोजाना 12 घंटे या उससे भी ज्यादा  कार्य करते हैं, क्योंकि इमरजेंसी में उन्हें यह करना पड़ता है। यह कुछ ही दिनों के लिए होता है। ऐसे लोग भी हैं, जो इतने या इससे भी ज्यादा समय कार्यालय में बिताते हैं... यह अच्छी बात नहीं है। जब कार्यालयों में लोग लंबे समय तक रहते हैं, तो वे ज्यादा गलतियां करते हैं और फिर उन्हें सुधारने में ही काफी वक्त लग जाता है।’

‘हमें अपने जीवन में संतुलन बनाए रखना चाहिए। मेरी राय में यह दिनचर्या लाभदायक हो सकती है- 1. सुबह उठो, तैयार होओ, अच्छा नाश्ता करो और डय़ूटी पर जाओ। 2. डय़ूटी पर आठ या नौ घंटे जमकर, स्मार्ट तरीके से कार्य करो। 3. घर वक्त पर पहुंचो। 4. परिवार को समय दो, बच्चों से खेलो, किताबें पढ़ो। टीवी देखो वगैरह। 5. अच्छी तरह भोजन करो और बढ़िया नींद लो। याद रखें, जो इनमें से पहले, तीसरे, चौथे या पांचवें काम को ठीक से नहीं कर पाते, वे दूसरे कार्य यानी डय़ूटी ठीक से नहीं कर पाते। जो लोग देर से घर पहुंचते हैं, उनका परिवार इसकी कीमत चुकाता है।’

‘कई लोगों को लगता है कि अगर वे ऑफिस में न रहे, तो कुछ अनहोनी हो जाएगी..., और उन्हें यह लगता ही रहता है, ऐसी अनहोनी कभी नहीं होती। बेहतर है कि आप आराम के वक्त आराम और काम के वक्त काम करें। आपका आराम भी जरूरी है। आप आराम करेंगे, तभी बेहतर काम कर सकेंगे।’

खुद के अनुभव से सीखें
नारायण मूर्ति खुद के अनुभव से सीखने को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। ‘आप कैसे और क्या सीखते हैं, यह महत्वपूर्ण है, यह नहीं कि आपने कहां से सीखा? सीखने की क्षमता और गुणवत्ता अच्छी है, तो यह बात ज्यादा फायदे की है। सफलताओं से सीखना ज्यादा कठिन है, बनिस्बत विफलताओं के। जब भी हम नाकाम होते हैं, हम उसके बारे में गहनता से सोचते हैं। कामयाबी मिलने पर अक्सर ऐसा नहीं होता।’

‘दरअसल हमारा दिमाग इस तरह से विकसित होता है कि अगर सामने कोई चुनौती आए, तो हम उसे टालने का यत्न करेंगे। हम हमेशा उपयोगी, लेकिन नकारात्मक सलाहों को नजरअंदाज कर देते हैं। जो लोग चुनौतियों और अपनी आलोचनाओं से सीखना जानते हैं, वही कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ पाते हैं। याद रखिए, हमारे जीवन की सबसे बड़ी, महत्वपूर्ण और निर्णायक घटना यही होती है कि हम संकट के पलों में प्रतिक्रिया कैसे व्यक्त करते हैं?’

भारतीय परंपरा का महत्व
‘हमारी परंपरा आत्म ज्ञान की है। यही ज्ञान का सबसे बड़ा प्रकार है। ...यह अपने आप को भीतर तक जाकर समझना है। आप खुद में कितना यकीन करते हैं? आपमें हौसला है क्या? मानवता का कितना अंश आपमें जीवित है? अगर आपमें मानवता का अंश नहीं है, तो आप कभी अपनी सफलता को गरिमामय तरीके से प्राप्त नहीं कर पाएंगे। अनुभवों से सीखना इस बात पर निर्भर है कि आप अपने दिमाग को किस दिशा में लेकर जा रहे हैं? आपमें खुद को बदलने की कितनी इच्छा है? घटनाओं पर आपके दिमाग में कब, कौन-सी और कितनी तेज प्रतिक्रियाओं की बिजली कौंधती है?’

‘पहले मैं कुछ नहीं था। आज मैं कामयाब हूं... जीवन में आने वाले हर रोड़े ने, रास्ते के हर पत्थर ने मुझे सफलता की राह सुझाई है। यही रुकावटें थीं कि मैं आज सफल हो सका। मैं यह मानने को कतई तैयार नहीं कि हमारा भविष्य पहले से तय होता है। हम क्या करेंगे, क्या बनेंगे यह हम ही तय करते हैं। क्या आप यह मानते हैं कि आपका भविष्य लिखा जा चुका है या आप यह मानते हैं कि उसे अभी लिखा जाना है और भविष्य क्या होगा, यह तय करेंगे कुछ हालात? आपका भविष्य अनेक निर्णायक मोड़ों और शिक्षाप्रद संभावनाओं से गुजरेगा। मैं इसी रास्ते से होकर गुजरा हूं। यह बड़ा ही सुखकर रास्ता है, बड़ा ही दिलचस्प और उम्मीदों से भरा।

आपके निशां होंगे जमाने पर
नारायण मूर्ति युवाओं के लिए आश्वस्त हैं। उन्हें भरोसा है कि युवा वक्त की रेत पर अपने निशान जरूर छोड़ेंगे। ‘हम सब अपनी आने वाली पीढ़ी के अभिरक्षक या रखवाली करने वाले हैं। हम चाहे कुछ भी उपलब्धि प्राप्त कर लें, कोई भी संपत्ति बना लें या साम्राज्य ही क्यों न खड़ा कर लें, चाहे वह आर्थिक, बौद्धिक, भावनात्मक उपलब्धि ही क्यों न हो, हम होंगे तो उसके कस्टोडियन ही। आपके पास जो भी संपदा हो, उसका सर्वोत्तम उपयोग यही है कि आप उसे उन लोगों के साथ बांटें, जो कम सौभाग्यशाली हैं। हम जो फल आज खा रहे हैं, उसे देने वाले पेड़ हमने नहीं लगाए हैं। उनके पौधे हमने नहीं रोपे हैं। उनके बीजों को हमने अंकुरित नहीं किया है। अब यह हमारी बारी है कि हम उन पेड़ों को लगाने की तैयारी करें, जिनके फल शायद हम जीते जी नहीं खा पाएंगे, लेकिन हमारी आने वाली नस्लें उनका फायदा ले पाएगी।’
प्रकाश हिन्दुस्तानी

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