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विरला दोस्त, प्रिय लेखक

ज्ञानरंजन ने लिखना बहुत पहले छोड़ दिया था, लेकिन अपनी कम कहानियों के साथ भी वे हिन्दी के प्रमुख कहानीकार माने जाते हैं। ज्ञानरंजन की संगठन क्षमता भी अनोखी है और पहल उनकी साहित्यिक समझ के साथ इस क्षमता का भी उदाहरण है। उनके मित्रों की तादाद भी बहुत बड़ी है। उनके पचहत्तर वर्ष पूरे होने के मौके पर खास मित्र रवींद्र कालिया साथ बिताए दिनों को याद कर रहे हैं।

साठ की पीढ़ी के लगभग सभी हस्ताक्षरों ने अब पचहत्तर पार कर लिया है। दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, विजय मोहन सिंह, गिरिराज किशोर, मधुकर सिंह, से. रा. यात्री कौन ऐसा है, जो पचहत्तर पार नहीं है। इसके विपरीत पचास की पीढ़ी इतनी भाग्यशाली नहीं रही। मोहन राकेश तो अपनी रचनाशीलता के स्वर्णकाल में ही चले गए, रेणु भी सत्तर पार नहीं कर पाए। देवीशंकर अवस्थी भी कम उम्र में ही दुनिया को अलविदा कह गए। ये सब अपने समय की बड़ी प्रतिभाएं थीं। लेकिन कई बार प्रतिभा का विस्फोट भी घातक सिद्ध होता है। इन लोगों के साथ यही हुआ।

एक अजीब बात है कि हिंदी में दीर्घायु होने का अर्थ प्राय: यह लगाया जाता है कि अंतिम सांस तक लेखन में लगे रहो मुन्ना भाई। प्राय: देखा गया है कि रचनात्मक अवधि नि:शेष होने पर भी लोग लिखते रहते हैं। कुछ लोग तो रिटायरमेंट के बाद जब पेंशन मिलने लगती है, तब लिखने का प्रण लेते हैं। सारी जिंदगी वे इसी उम्मीद में नौकरी करते रहते हैं कि रिटायरमेंट के बाद इत्मीनान से लिखेंगे। बच्चे पढ़-लिख गए, नौकरी में आ गए, सबके शादी-ब्याह हो गए। अब सारी जिम्मेदारियों से मुक्ति पाने के बाद ऐसे लोग साहित्य सेवा पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। लेकिन इन तमाम लोगों के बीच ज्ञानरंजन ने एक अनूठा उदाहरण पेश किया है। उसने अधेड़ होने से पहले ही लेखन से संन्यास ले लिया था। इससे हिंदी के बहुत से लेखकों को सीखना चाहिए।

यहां एक दिलचस्प प्रसंग याद आ रहा है। एक बार अश्क जी नए लेखकों को उपदेश दे रहे थे कि तुम लोग न लिख कर अपना समय नष्ट कर रहे हो। उनकी इस बात पर एक नए लेखक ने तपाक से जवाब दिया कि हम लोग तो न लिख कर सिर्फ अपना समय नष्ट कर रहे हैं, लेकिन कुछ लोग तो लिख कर सिर्फ अपना ही नहीं, पाठकों का भी समय नष्ट करते हैं। जाहिर है कि इशारा अश्क जी की तरफ ही था। इस पर अश्क जी बहुत नाराज हुए थे और उस गोष्ठी में जूता-चप्पल चलने की नौबत आ गई थी।

ज्ञानरंजन से मेरा संबंध बहुत पुराना है। लगभग पचास साल से हमारी दोस्ती है। दोस्ती भी ऐसी कि इलाहाबाद में तो 24 घंटे का साथ था। हम साथ-साथ ही उठते-बैठते, लिखते-पढ़ते, खाते-पीते-सोते थे। यहां तक कि एक दिन सुनयना जी का फोन आया कि कई दिनों से ज्ञान का कुछ अता-पता नहीं है। आपको कुछ खबर है। मैंने पूछा कि पति-पत्नी में कोई झगड़ा या मन-मुटाव तो नहीं हुआ? सुनयना ने बताया कि नहीं, घर से तो बड़ी खुशी-खुशी निकले थे। मैंने रिसीवर ज्ञान के हाथ में देकर कहा कि लीजिए बात कीजिए। दरअसल, ज्ञान की शख्सियत एक फक्कड़, मलंग और फकीर की शख्सियत है। वह कहीं भी रम सकता है। यहां तक कि इलाहाबाद के नमकीन-मिठाइयों के बाजार लोकनाथ में घंटों बिता सकता है। उसे मालूम होता है कि किस दुकान में क्या खाने लायक है। उन दिनों उसे पूरा मेन्यू याद रहता था। ज्ञान के अलावा विश्वनाथ त्रिपाठी का भी उस गली में बहुत मन लगता है। ज्ञान की एक विचित्र धारणा थी कि पकौड़ा तलने वाला जितना गंदा होगा, पकौड़े उतने ही स्वादिष्ट होंगे। गनीमत है कि लेखकों के लिए उसने ऐसा कोई मानदंड नहीं रखा।

उसके दो-तीन ही प्रिय कथाकार हैं- अमरकांत, शेखर जोशी और दीपक श्रीवास्तव। इलाहाबाद में एक दौर था कि ज्ञान, दूधनाथ, नीलाभ और मैं इलाहाबाद की अपनी प्रिय सड़कों पर जी भर कर आवारागर्दी करते थे। कुछ सड़कें तो भूलती ही नहीं। कैंटोनमेंट की पुनप्पा रोड़ ज्ञान और मुझे बहुत प्रिय थी। पतझड़ के दिनों में पूरी सड़क पर नीम की पत्तियों की सेज बिछ जाती थी और सड़क चलते आप पर पत्तियों की बरसात होती रहती थी। जाने कितनी शामें हमने इस सड़क पर साथ-साथ आवारागर्दी की है।

उन दिनों ज्ञानरंजन प्राय: बड़े लेखकों की सोहबत से दूर ही रहता था। लेखक लोग अगर कॉफी हाउस में बैठते तो वह थोड़ी दूर पर एक बंगाली ढाबेनुमा रेस्टोरेंट मुरारी में समय बिताया करता था। उन दिनों उसके मित्रों में बहुत कम रचनाकार थे। विचित्र-विचित्र किस्म के लोगों से उसकी दोस्ती थी। कोई रेलवे में काम करता था तो कोई पोस्ट ऑफिस में। उसे अगर ढूंढ़ना हो तो मुरारी आदर्श जगह थी, जहां के मालिक और बैरे उसे बहुत प्यार करते थे। उसे देखते ही वे संदेश और सिंघाड़ा (समोसा) पेश कर देते। यही उसका टी-हाउस था और शायद पैट्रोला भी। ज्ञान शुरू से ही मुंहफट था। किसी भी वरिष्ठ लेखक को वह नाली का कीड़ा कह सकता था। मुरारी से वह इस तरह के बम अक्सर छोड़ता रहता था। इसे उसकी शख्सियत का प्रभाव ही कहा जाएगा कि उसके पीड़ित वरिष्ठ लेखक भी उसे बहुत प्यार करते थे।

यूं वह नौकरी जबलपुर में करता था और रहता इलाहाबाद में था। ऐसी नौकरी भगवान सबको दे। मालूम नहीं कि उसे तनख्वाह मिलती भी थी या नहीं, लेकिन  इतना तय है कि वह उसी कॉलेज से रिटायर हुआ था। ये लंबी छुट्टी उसने अपनी शादी का प्रोग्राम बना कर ली थी। इस बीच उसे लड़की पटानी थी और विवाह करना था। दोनों कामों में उसे अभूतपूर्व सफलता मिली। साठ के दशक में वह पड़ोस के सुप्रसिद्ध वैद्य की गुजराती लड़की को लेकर भूमिगत हो गया। न उसके घरवालों को उसकी खबर मिली और न लड़की के ही घरवालों को ही और आखिरकार उसने विवाह कर लिया।

ज्ञानरंजन उन लेखकों में नहीं है, जो साहित्य को ओढ़ते-बिछाते हैं। उसे न तो किसी ने कभी अपनी कहानी की चर्चा करते सुना होगा, न कहानी सुनाते, जबकि उन दिनों कहानी सुनाने का मर्ज इलाहाबाद में प्लेग की तरह फैला हुआ था। यहां तक कि दोस्त लोग कथाकारों से कन्नी काटने लगे थे कि जाने कौन कब और कहां कहानी सुनाने बैठ जाए।

अखिलेश ने ठीक ही लिखा है कि सन साठ के बाद के लेखकों के आपसी रिश्तों के बारे में कभी भविष्यवाणी नहीं करनी चाहिए। जहां साहित्य जगत में यह प्रचलित हो कि दूधनाथ और ज्ञान में अबोला चल रहा है तो इसे देख कर आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि वहीं दोनों किसी ढाबे में बैठ कर मौज-मस्ती कर रहे हों। इन पचास वर्षों में ज्ञान से मेरा रिश्ता कभी नहीं टूटा। अभी दो दिन पहले ही लखनऊ से उसका फोन आया था। वह मेरी बीमारी से चिंतित था और मेरे हाल-चाल ले रहा था।

मुझे याद आ रहा है कि मेरे बेटे की शादी थी। मैंने उससे कहा कि मुझे शादियां करवाने का कोई अनुभव नहीं है, तुम आकर बेटे की शादी करवाओ। वो आया और बड़ी कुशलता से उसने सारी औपचारिकताओं को निपटाया। मैंने पहल सम्मान के दौरान भी उसे बड़े-बड़े समारोहों को मैनेज करते देखा है। सैकड़ों लेखक किसी तीसरे शहर में इकट्ठे होंगे और ज्ञान के चेहरे पर शिकन तक न होगी, जबकि संयोजक वही होता था। सच तो ये है कि हिंदी में दो लोगों ने ही ईवेंट मैनेजमेंट में महारत हासिल की है-एक ज्ञानरंजन और दूसरे अशोक वाजपेयी। इनका कोई सानी नहीं। अशोक को भी मैंने जंगलों में साहित्यिक गोष्ठियां करते देखा है और भारत भवन में अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियां करते। ईवेंट
मैनेजमेंट वाले संस्थानों को इन्हें विशेष रूप से आमंत्रित करना चाहिए और इस क्षेत्र में डॉक्टरेट की उपाधि देनी चाहिए। ज्ञान जैसे मित्र विरल ही दिखाई देते हैं।
(शशिभूषण द्विवेदी से बातचीत पर आधारित)

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