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कहीं जानलेवा तो नहीं हो गई जान बचाने वाली दवा

ऑपरेशन से पहले मरीज को दी जाने वाली बेहोशी की दवा एनस्थीसिया का सही तरीके से डिस्पोजल न होना अस्पताल में मौत का सबब किस तरह बन सकता है, इसका उदाहरण है कोलकाता के एएमआरआई अस्पताल में हुआ आग का हादसा।

वैसे तो यह दवा मरीज की जान बचाने का काम करती है, मगर इससे निकलने वाली गैस अस्पताल में आग के खतरे को कई गुना बढ़ा देती है। इस खतरे से एक ही सूरत में बचा जा सकता है और वह है एजीएसएस एनेस्थेटिक गैस सेगरेजिंग सिस्टम की व्यवस्था।

चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में गैस और एसी प्लांट विशेषज्ञ विनीत कुमार बताते हैं कि बेहोशी से पहले मरीज को एक विशेष तरह की हैलोथीन और आइसोफ्लूरेन गैस दी जाती है। यह बाजार में तरल रूप में उपलब्ध होती है। इसे गैस में परिवर्तित कर इसकी डोज से मरीज को बेहोश किया जाता है। हैलोथीन और आइसोफ्लूरेन लेने के बाद मरीज जब सांस लेता है तो वह यही जहरीली गैस बाहर निकालता है।

सुरक्षा मानकों के मुताबिक, एनस्थीसिया के बाद फैलने वाली इन गैंसों की अस्पताल परिसर से निकासी के लिए एजीएसएस एनस्थेटिक गैस सेगरेजिंग सिस्टम का अलग से प्लांट होना चाहिए। यह प्लांट सभी प्रमुख ऑपरेशन थियेटर से जुड़ता हुआ चिमनी की तरह अस्पताल के छत से बाहर की ओर खुलता है। प्लांट में लगा फिल्टर गैस के असर को कम कर उसे वातावरण में फैलने से रोकता है।

एनस्थीसिया गैस के अलावा अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली सीओटू, एनटूओ और एचटूओ की भी यदि सही ढंग से मॉनिटरिंग न की जाए तो आग लगने का खतरा बना रहता है। इस सब के बीच शार्ट सर्किट से बचने के लिए इलेक्ट्रिक बोर्ड और वायर की भी निगरानी जरूरी है।

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