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असल मुद्दा संसद की सर्वोच्चता का है

आखिरकार लोकतांत्रिक भावना की जीत हुई। यूपीए सरकार द्वारा खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत के अपने फैसले पर फिलहाल रोक लगा देने के बाद शीतकालीन सत्र का गतिरोध खत्म हो गया है। संसद सत्र के दौरान कैबिनेट द्वारा लिए गए इस एकतरफा फैसले के कारण ही संसद की कार्यवाही में बाधा पड़ी थी। केंद्रीय मंत्रिमंडल को कार्यपालिक निर्णय लेने का अधिकार जरूर होता है, लेकिन अक्लमंदी इसी में है कि इतने महत्वपूर्ण फैसले को संसद के अनुमोदन से ही लिया जाए। सरकार को इस मामले में विरोधियों के सामने झुकना पड़ा है।

जनमत के इसी दबाव ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए में शामिल कुछ सहयोगी दलों को भी इस कदम का विरोध करने के लिए मजबूर कर दिया था। वैसे भी संसदीय जनतंत्र की भावना का तकाजा है कि जब संसद का सत्र चल रहा हो, तो उसके अनुमोदन के बिना ऐसा कोई निर्णय नहीं किया जाए।

यही हमारी संवैधानिक व्यवस्था की भावना है, जिसके तहत सर्वोच्च संप्रभुता देश की जनता में निहित है। जनता अपनी इस संप्रभुता का व्यवहार संसद में तथा विधायिकाओं में अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से करती है। हमारी संवैधानिक व्यवस्था में कार्यपालिका (सरकार) विधायिका (संसद/विधानमंडल) के प्रति जवाबदेह है और विधायिका जनता के प्रति। इसलिए ऐसा कोई भी फैसला, जिसका जनता की आजीविका तथा हमारी अर्थव्यवस्था की मजबूती पर दूरगामी असर पड़ने जा रहा हो, विधायिका के प्रति कार्यपालिका की जवाबदेही को ताक पर रखकर नहीं लिया जाना चाहिए। इसे तो अब नियम ही बना दिया जाना चाहिए। जब कभी इस नियम का उल्लंघन हो रहा हो, तो संसद को यह सुनिश्चित करने के लिए सतर्कता दिखानी चाहिए कि उसके प्रति जवाबदेही को ताक पर रखे जाने की इजाजत सरकार को कतई नहीं मिलेगी।

खुदरा व्यापार के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत देने के कैबिनेट के इस फैसले के खिलाफ संसद ने ऐसी सतर्कता का ही तो प्रदर्शन किया है। संसद की कार्यवाही में बाधा डालने के लिए सबसे पहले तो सरकार का यह फैसला ही जिम्मेदार है। यह दूसरी बात है कि सरकार ने संसद की कार्यवाही बाधित होने के लिए विपक्ष के सिर पर दोष मढ़ने की कोशिश की और यह दलील दी कि वह तो संसद के दोनों सदनों में इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए तैयार थी। लेकिन जब तक कैबिनेट का उक्त फैसला अपनी जगह बना रहता, इस तरह की चर्चा की सार्थकता ही भला क्या होती?

वास्तव में वर्तमान अनुभव से भविष्य में आने वाली सभी सरकारों के लिए एक नजीर कायम हो गई है कि जनता के जीवन पर इतना भारी प्रभाव डाल सकने वाले फैसले संसद के अनुमोदन के बिना नहीं लिए जाने चाहिए। वैसे भी, जब संसद का सत्र चल रहा हो, तब तो अपेक्षाकृत मामूली महत्व के निर्णय भी कार्यपालिक फैसले के रूप में नहीं लिए जाने चाहिए।

केंद्र सरकार के इस निर्णय के खिलाफ विरोधियों ने अपने तर्क विस्तार से रखे थे। इस मामले में अब आगे कोई भी निर्णय लेने से पहले सरकार को इन सभी तर्को पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। अब जबकि सरकार का उक्त फैसला उठाकर ताक पर रख दिया गया है, तब शायद इस मुद्दे पर संसद में बहस की इजाजत न मिले। फिर भी यह महत्वपूर्ण है कि इस तरह का कोई भी फैसला लेने से पहले हमारी अर्थव्यवस्था तथा जनता की आजीविका पर उसके गंभीर परिणामों की गहराई से छानबीन कर ली जाए।

पिछले साल का पूरा शीतकालीन सत्र, टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति के गठन से सरकार के हठधर्मितापूर्ण इनकार के चलते बरबाद हो गया था। आखिरकार यूपीए सरकार को संयुक्त संसदीय कमेटी का गठन करना ही पड़ा। अगर उसने पहले ही ऐसी समझदारी दिखाई होती, तो पिछली बार का शीतकालीन सत्र भी बरबाद नहीं हुआ होता। बहरहाल, मौजूदा मामले में खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत देने के केंद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले को स्थगित किए जाने के बाद अब सत्र के बाकी तीन हफ्तों में तो संसद की कार्यवाही चलनी ही चाहिए।

खास बात यह भी है कि यूपीए सरकार को इस मामले में कैबिनेट के फैसले को स्थगित करने पर तो मजबूर होना ही पड़ा है, इसके साथ ही उसे संसद के दोनों सदनों में यह ऐलान भी करना पड़ा है कि इस मामले में आगे कोई भी निर्णय, सभी पक्षों से परामर्श के बाद आम राय के आधार पर लिया जाएगा। संसद में हुई सर्वदलीय बैठक में माकपा ने इस पर जोर दिया था कि इस तरह की आम राय संसद में सभी राजनीतिक पार्टियों और राज्य सरकारों को शामिल करके बनाई जाए। सरकार ने इस सलाह को मान ली है।

बहरहाल, इसका किसी भी तरह से यह अर्थ नहीं है कि खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का रास्ता बंद रखने की लड़ाई अब खत्म हो चुकी है। हमारी अर्थव्यवस्था तथा जनता की रोजी-रोटी के लिए विनाशकारी साबित होने जा रहे ऐसे कदमों के लिए साम्राज्यवादी ताकतों तथा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी ने पूरा जोर लगा रखा है, क्योंकि उन्हें इनमें अपने मुनाफे ज्यादा से ज्यादा करने के नए मौके दिखाई दे रहे हैं। वास्तव में, इस धारणा में काफी दम नजर आता है कि पिछले ही दिनों बाली में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा से हुई अपनी मुलाकात में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनसे ऐसे कदम का वायदा कर आए होंगे।

जाहिर है कि आज जब विश्व अर्थव्यवस्था दोहरे गोतेवाली मंदी के संकट से गुजर रही है, तब संभव है कि इस तरह के दबाव और भी बढ़ा दिए गए हों। अगर विदेशी पूंजी को अपने मुनाफे ज्यादा से ज्यादा करने के लिए इस तरह के मौके मुहैया कराए जाते हैं, तो इसके लिए भारतीय जनता के हितों की बहुत भारी कुर्बानी देनी पड़ेगी।

फिलहाल तो इस आपदा को टाल दिया गया है। लेकिन अब निरंतर जनसंघर्षों के जरिये जोरदार दबाव बनाया जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सरकार कहीं संसद का सत्र खत्म होने के फौरन बाद या आगे चलकर ऐसा कोई कदम नहीं उठाए। संसद के पूर्वानुमोदन के बिना ऐसे कदम उठाने की इजाजत कभी भी नहीं दी जानी चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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