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सर्दी की वर्दी में हमदर्दी का नया सीन

अहा, सर्दियों का शोर जनता के गुस्से की तरह धीरे-धीरे बढ़ रहा है। झोपड़ियां सालाना रस्म की तरह ठिठुरने लगी हैं। लोकपाल बिल पर कोहरा छाने लगा है। सरकार और अन्ना टीम एक-दूसरे पर दांत किटकिटाने लगे हैं। नगरों में पुराने गरम कपड़ों के बाजार सजने लगे हैं, वहां मरे अंग्रेजों के कपड़े बिक रहे हैं। यहां से दस-बीस रुपये का गरम चीथड़ा पहने, हर रिक्शा वाला दूर से चर्चिल लगने लगता है। सिगार की जगह उसके मुंह में बीड़ी है, तो क्या।

ऐसे में एक जातक कथा याद आती है- दो नंगे-अधनंगे कंगाल समुद्र के किनारे घूम रहे थे कि सर्दी से बचने के लिए कोई कपड़ा-वपड़ा मिल जाए। अचानक उन्हें मछली मारने का एक फटा जाल मिल गया। दोनों ने खुशी से जाल ओढ़ा और एक-दूसरे से चिपककर बैठ गए। पहले ने दूसरे से पूछा, ‘क्यूं कैसा लग रहा है?’ दूसरा बोला, ‘अच्छा लग रहा है। जाल फटा है, इसमें बड़े-बड़े छेद हो गए हैं, मगर बढ़िया है।’

कुछ देर दोनों कंपकंपाते रहे, फिर पहला बोला, ‘यार, ऐसी सर्दी में जब हमारे ये हाल हैं, तो गरीबों का क्या हाल होगा।’ दूसरे ने कहा, ‘अपना-अपना भाग्य है यार। ले बादाम खा।’ पहला बोला, ‘बादाम? अबे यह तो मूंगफली का छिलका है।’ दूसरे ने कहा, ‘अपना-अपना भाग्य है यार।’

कैलेंडर बताते हैं कि देवी-देवताओं को सर्दी नहीं लगती, वरना इस मौसम में रामजी कंबल, कृष्णजी रजाई और बर्फीले हिमालय पर शिवजी ओवरकोट पहने दिखाई देते। इंद्र के दरबार में ठंड के दिनों में मेनका, रंभा और उर्वशी भी दुशाला पहनकर नहीं नाच पातीं।

सर्दी को भी झुग्गी-झोपड़ी के गरीब लोग पसंद हैं। विधायक निवासों और राजभवनों की तरफ वह जाती ही नहीं। वहां के कुत्ते बिल्ली तक गरम वर्दी पहनते हैं। पहले सर्दी के मौसम में चौराहों पर नगर निगम वाले अलाव जलवाते थे। अब अलाव बड़े-बड़े होटलों के लॉन में जलते हैं। सर्दियों में पीने-पिलाने का दौर सुर्खियों में होता है।

मैंने सुना कि सर्दियों के मौसम में रावण ने एक दिन कुछ ज्यादा पी ली और नशे में पूरा कैलाश पर्वत उठा लिया। नशा उतरने के बाद उसे कहां रखा, ये किसी को पता नहीं। मुझे पता है। वह जहां का तहां धरा है।
उर्मिल कुमार थपलियाल

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