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सोच क्यों नहीं बदल सकती

रात में लौटते हुए उन्हें महसूस होता रहा कि वह कहीं अटक गए हैं। उनका मन अपने आसपास के तमाम लोगों को कोसने को करने लगा। आखिर यही लोग तो हैं, जिन्होंने उनकी जिंदगी को अटका कर रख दिया।

‘हम भी गलत हो सकते हैं। हमारे विचार भी बदल सकते हैं। हम जब इतने खुलेपन से नहीं सोचते हैं, तो जिंदगी में दिक्कत होती है। और यही खतरनाक है।’ यह मानना है डॉ. केन ईसोल्ड का। वह द विलियम ऐलंसन व्हाइट इंस्टीट्यूट में ऑरगेनाइजेशनल प्रोग्राम के संस्थापक रहे हैं। पिछले साल उनकी किताब ‘व्हाट यू डॉन्ट नो, यू नो’ की खूब चर्चा हुई थी।

जिंदगी जीने के लिए एक खुलापन जरूरी होता है। उस खुलेपन के बगैर हमारी जिंदगी अटकी-सी महसूस होती है। एक दौर में हम एक सच पर जान निछावर कर देते हैं। लेकिन यह तो जरूरी नहीं कि बाद के किसी दौर में वही सच हो। जिंदगी रुकने का नाम नहीं है। समय चलता रहता है और हम बदलते रहते हैं। उस समय के साथ कदमताल करने के लिए हमें बदलना होता है। हम नहीं बदलते, तो समय आगे बढ़ जाता है और हम कहीं ठिठके खड़े रह जाते हैं।

कहीं भी किसी दौर में ठिठक जाना सोचने पर मजबूर करता है। या उसे मजबूर करना चाहिए। ठिठक जाना या रुक जाना जिंदगी नहीं है। एक सच या चीज से चिपक जाना हमारे लिए अच्छा नहीं है। उससे चिपकने का मतलब है कि हम खुलना नहीं चाहते। और खुले बगैर जिंदगी का अटकना तय है। यहीं से हमारी जिंदगी खतरनाक मोड़ लेने लगती है।

समय की सच्चाई कुछ है और हम किसी दूसरी ओर जा रहे हैं। हमें लगातार अपनी जिंदगी पर सोचना होता है। उसमें जरूरी बदलाव करने होते हैं। उसके लिए हमें सबसे पहले यह मानना होता है कि हम भी गलत हो सकते हैं। हमारी सोच में कोई गड़बड़ हो सकती है।
राजीव कटारा

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