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ईमानदारी और समझदारी

अन्ना एक बार फिर सरकार से दो-दो हाथ करने के मूड में हैं। धमकी दे रहे हैं कि अबकी निर्णायक लड़ाई होगी, यानी आर-पार की। अब निर्णायक लड़ाई का क्या मतलब है? क्या जन-लोकपाल कानून की अधिसूचना अन्ना रामलीला मैदान से खुद जारी कर देगें? कुछ बोलना है, क्या बोलना है, इस पर किसी का नियंत्रण नहीं रह गया है। दरअसल अन्ना ईमानदार हैं, उनकी ताकत भी ईमानदारी है। अब ये तो जरूरी नहीं है कि ईमानदार आदमी समझदार भी होगा। बस समझदारी से काम न लेना ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है।

अब देखिए, सड़क पर उतरने वाली भीड़ को अन्ना अपना समर्थक मानते हैं, उन्हें लगता है कि उनकी आवाज पर भीड़ सड़क पर आ जाती है, पर ऐसा है नहीं। इस भीड़ का दुश्मन नंबर एक हैं राजनेता। क्योंकि लोग देखते हैं कि पहला चुनाव लड़ने के वक्त जिस नेता की हैसियत महज 1974 मॉडल जीप की थी, आज वह कई एकड़ वाले रिसॉर्ट, फरारी, पजेरो और होंडा सिटी कार का मालिक बन गया है।

जाहिर है, नेताओं के आचरण से नाराज जनता सड़कों पर उतर रही है और यह नाराजगी किसी एक पार्टी से नहीं है, पूरी व्यवस्था से है। टीम अन्ना द्वारा ग्रुप सी के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने की बात की जा रही है। क्या आप मानते हैं कि नेता और अफसर ईमानदार हों, तो कर्मचारी बेईमानी कर सकेंगे? ग्रुप सी के 57 लाख कर्मचारियों को अगर इसके दायरे में लाया गया, तो लोकपाल पर काम का इतना बोझ हो जाएगा कि उसकी गुणवत्ता प्रभावित होगी।
आईबीएनखबर में महेंद्र श्रीवास्तव

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