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स्थिरता की ओर

ग्यारह महीने पहले अमेरिकी विदेश विभाग ने अपने नागरिकों के लिए नेपाल की यात्रा को लेकर कुछ हिदायतें जारी की थीं। तब अमेरिका ने नेपाल को उन देशों की सूची में डाल दिया था, जहां जाने का मतलब अपनी जान को जोखिम में डालना था। अब अमेरिका ने नेपाल का नाम उस सूची से हटा दिया है। यह खबर स्वागत के योग्य है। यकीनन नेपाल में सुधरते हालात को देखते हुए यह फैसला लिया गया है।

हालांकि अब भी अमेरिका ने 31 देशों के लिए यात्रा संबंधी चेतावनियां जारी कर रखी हैं। इनमें पाकिस्तान, फलस्तीन और कांगों के नाम उल्लेखनीय हैं। इस सूची में सीरिया, लीबिया व ट्यूनीशिया को हाल ही में शामिल किया गया है। खैर, इन चेतावनियों को गैर-सरकारी कर्मचारी कितनी गंभीरता से लेते हैं, यह कोई नहीं जानता। लेकिन इतना तो तय है कि अधिकतर पर्यटक इस सूची पर एक निगाह जरूर डालते हैं। इस लिहाज से नेपाल के बारे में अमेरिका का ताजा फैसला उन सैलानियों के लिए राहत की बात है, जो यहां आने के लिए इच्छुक हैं।

ब्रिटिश विदेश विभाग व राष्ट्रमंडल कार्यालय ने भी कुछ अरसे पहले तक चेतावनियां जारी कर रखी थीं। लेकिन अब उन्होंने भी काफी हिदायतें वापस ले ली हैं। इस सकारात्मक बदलाव के दो अर्थ हैं। इसका पहला संकेत तो यही है कि सरकार की हालिया राजनीतिक उपलब्धियों से अमेरिकी प्रशासन संतुष्ट है। अमेरिकी प्रशासन की नजर सात-सूत्री समझौते पर है। ये समझौते शांतिपूर्ण व स्थिर नेपाल की स्थापना के उद्देश्य से किए गए हैं। यह सुकूनदेह बात है कि नेपाल सरकार पर विश्व बिरादरी में भरोसा बढ़ रहा है।

दूसरा अर्थ यह है कि इससे देश के पर्यटन उद्योग में उछाल आने की उम्मीद बढ़ी है। वैसे, नेपाल पर्यटन बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक साल 2011 के बीते 11 महीनों में पर्यटन उद्योग को अब तक का सर्वाधिक मुनाफा हुआ है। जाहिर है, इस तरह की सूची में नाम आने भर से सैलानियों की सेहत पर खास फर्क नहीं पड़ता। लेकिन यह भी बात सही है कि अमेरिकी फैसले से अब सैलानियों की संख्या और बढ़ेगी, देश कर राजस्व बढ़ेगा व सुरक्षित निवेश का महौल बनेगा।
द काठमांडू पोस्ट, नेपाल

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