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काशी का बहु संस्कृतिवाद दुनिया के लिए उदाहरण

वाराणसी कार्यालय संवाददाता। काशी का बहु संस्कृतिवाद दुनिया के लिए एक उदाहरण है। बीएचयू के सामाजिक विज्ञान संकाय में भारत-ऑस्ट्रेलिया के सांस्कृतिक सम्बंधों पर गुरुवार को आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने यह मत व्यक्त किये। संगोष्ठी बीएचयू की यूनेस्को चेयर फॉर पीस एंड इंटरकल्चरल अंडरस्टैंडिंग और ऑस्ट्रेलिया-इंडिया इंस्टीट्यूट के तत्वावधान में आयोजित की गयी थी।

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर के ऑस्ट्रेलिया-इंडिया इंस्टीट्यूट के निदेशक पद्मश्री प्रो. अमिताभ भट्ट ने कहा कि बनारस की साझा सांस्कृतिक समझ पूरी दुनिया के लिए एक सबक है। यहां जिस तरह लोग एक-दूसरे के धर्मो का आदर करते हुए रहते आ रहे हैं, इसको रोल मॉडल बनाकर विश्व शांति की दिशा में बड़ा कार्य किया जा सकता है।

प्रथम सत्र के मुख्य अतिथि संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. वीरभद्र मिश्र ने कहा कि बहुसंस्कृतिवाद के महत्व को हिन्दू धर्म के जरिये आसानी से समझा जा सकता है। काशी में रहने से ही अच्छे संस्कार विकसित हो जाते हैं।

मुफ्ती-ए-बनारस मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी ने कहा कि सभी को एक-दूसरे के धर्मो और संस्कृतियों का आदर करना चाहिये। बनारस में हिन्दू-मुस्लिम का ताना-बाना आज पूरी दुनिया के लिए अमन पसंद क्षेत्र का उदाहरण बन चुका है। मेलबर्न विश्वविद्यालय के डॉ. प्रदीप तनेजा ने कहा कि ग्लोबलाइजेशन से हो रही दिक्कतों को दूर करने के लिए विभिन्न संस्कृतियों के बीच तारतम्य बैठाना होगा।

यूनेस्को शांतिपीठ के प्रभारी प्रो. प्रियंकर उपाध्याय ने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया की उदार संस्कृति एक-दूसरे धर्मो का आदर करना सिखाती है। संगोष्ठी में प्रो. मल्लिकार्जुन जोशी, प्रो. आरसी मिश्र, प्रो. केविन, प्रो. ब्रूस सिंह, प्रो. जयकांत तिवारी, प्रो. निक हिल, डॉ. मनोज मिश्र, डॉ. अमर ज्योति सिंह, डॉ. संजय श्रीवास्तव, डॉ. घनश्याम, प्रो. एके जोशी, प्रो. राजेन्द्र राय, डॉ. एनपी सिंह, धर्मवीर सिंह, मौलाना वसीम अहमद आदि ने विचार व्यक्त किये। संचालन अनिता डे और आभार प्रो. अंजूशरण उपाध्याय ने व्यक्त किया।

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